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अब प्रॉपर्टी को मिलेगी डिजिटल पहचान मोदी सरकार का नया फार्मूला । (20 Nov 2017)

नई दिल्लीः जल्द ही सभी अपनी प्रॉपर्टी की लोकेशन मैप पर देख सकेंगे। जल्द सरकार इसके लिए डिजीटल मैप लाने जा रही है। इसके लिए सरकार ने दिल्ली और नोएडा में पायलट प्रोजैक्ट शुरू भी कर दिए हैं।

अब सम्पत्ति की लोकेशन की डिजीटल पहचान बनाई जाएगी और सरकार लोकेशन को डिजीटल टैग करेगी। डाक विभाग ने पायलट प्रोजैक्ट की शुरूआत भी कर दी है। इसके तहत हर सम्पत्ति को 6 अंकों व अक्षरों का नंबर दिया जाएगा। वैबसाइट मैप माई इंडिया को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई है। प्रोजैक्ट की सफलता के बाद पूरे देश में इसे लागू किया जाएगा। ई-लोकेशन से पता खोजने  में आसानी होगी और ई-कॉमर्स, ट्रांसपोर्टेशन में वक्त और पैसे की बचत होगी। वैबसाइट इस काम के लिए ‘इसरो’ और नैशनल सैटेलाइट इमेजरी सर्विस ‘भुवन’ की मदद लेगी।

इस परियोजना के तहत आवास तथा व्यवसाय करने की जगह का डिजीटल एड्रैस तैयार होगा ठीक वैसे जैसे व्यक्तिगत पहचान के लिए आधार कार्ड नंबर दिया गया है। डिजीटल एड्रैस में छह अंकों व अक्षरों का एक नम्बर लोगों के पते की पहचान बन जाएगा जो कि काफी छोटा और सरल होगा। सूत्रों के अनुसार शुरुआत में तीन पोस्टल कोड पर यह काम किया जा रहा है, इसमें एक दिल्ली और दूसरा नोएडा का है। पोस्टल एड्रैस डिजीटल होने पर पता लग सकेगा कि प्रॉपर्टी किसके नाम पर है, उसका टैक्स रिकॉर्ड भी देखा जा सकेगा और यह भी पता लग सकेगा कि उस प्रॉपर्टी पर बिजली-पानी और गैस कनैक्शन है या नहीं। 

 

Source: www.punjabkesari.in


आम आदमी को मकान खरीदने की राहत मोदी कैबिनेट ने लिया अहम् फैसला । (18 Nov 2017)

नई दिल्ली: केंद्रीय कैबिनेट ने शहरों में घर खरीदने की चाहत रखने वालों को होम लोन में बड़ी राहत दी है। प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के तहत होम लोन पर मिलने वाली क्रैडिट लिंक सबसिडी स्कीम के अधीन बनाए जाने वाले घरों का दायरा बढ़ा दिया गया है। 
मिडल इन्कम ग्रुप यानी कि मध्यम आय वर्ग (कैटेगरी-1) में शामिल लोगों को मिलने वाले होम लोन के साथ अब 90 वर्ग मीटर की बजाय 120 वर्ग मीटर का मकान बनाया जा सकेगा जबकि कैटेगरी-2 में शामिल लोग 110 की बजाय 150 वर्ग मीटर का मकान बना सकेंगे। 6 लाख से लेकर 12 लाख तक की आय वाले लोगों को मध्यम आय वर्ग कैटेगरी-1 में रखा गया है जबकि 12 से लेकर 18 लाख तक के आय वर्ग को कैटेगरी-2 में रखा गया है। कैटेगरी-1 को 9 लाख तक के होम लोन पर 4 प्रतिशत ब्याज सबसिडी मिलेगी जबकि कैटेगरी-2 को 12 लाख के होम लोन तक 3 प्रतिशत ब्याज सबसिडी मिलेगी। यह लोन 20 साल की अवधि तक लिया जा सकता है। 9 और 12 लाख से ऊपर तक के होम लोन पर कोई सबसिडी नहीं मिलेगी। यह योजना 31 मार्च, 2019 तक लागू रहेगी।

जी.एस.टी. को लेकर दिया यह तोहफा
मोदी सरकार ने दूसरा बड़ा तोहफा जी.एस.टी. को लेकर दिया है। मोदी कैबिनेट ने मुनाफा विरोधी अखिल भारतीय समिति को स्थापित करने को हरी झंडी दे दी है। इससे आम लोगों तक जी.एस.टी. के घटे  रेट  का फायदा नहीं पहुंचाने वालों के खिलाफ  कार्रवाई की जा सकेगी।

दाल के निर्यात से प्रतिबंध हटा
कैबिनेट ने दाल को लेकर भी आम आदमी को बड़ी राहत दी है। कैबिनेट ने दालों के निर्यात पर लगे प्रतिबंध को भी हटा दिया है। केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि किसानों को अपने उत्पाद बेचने के लिए ज्यादा विकल्प दिए जाएंगे ताकि उनकी आय में बढ़ौतरी हो सके।

क्या होगा असर 
-इस योजना के बाद शहरों में घरों की मांग बढ़ सकती है।
-अब होम लोन के आवेदन करने वालों के पास एक से अधिक डिवैल्पर्स के पास जाने का विकल्प मौजूद रहेगा। 
-कार्पेट एरिया को बढ़ाने से पहले से तैयार फ्लैट्स की बिक्री में तेजी आएगी।

 

Source: www.punjabkesari.in


मोदी सरकार करेगी बेनामी संपत्ति पर वार, टेक्नोलॉजी से होगी छानबीन । (14 Nov 2017)

भोपालः नोटबंदी और जी.एस.टी. के बाद मोदी सरकार का अगला निशाना बेनामी संपत्ति है। बेनामी संपत्ति की जांच के लिए आयकर विभाग पहली बार इसरो की मदद लेगा। इस मुहिम में देश की अन्य जांच एजेंसियों की मदद भी ली जाएगी। सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्स (सी.बी.डी.टी.) ने यह प्रयोग गुजरात और राजस्थान में कराया, जिसके अच्छे नतीजे निकले। अब मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में भी 'आसमानी आंख' से बेनामी संपत्तियों की खोजबीन शुरू होगी।

ये जांच एजेंसियां करेंगी मदद
आयकर विभाग ने एक बेनामी प्रॉपर्टी यूनिट भी बनाई है, जहां ऐसी सभी संवेदनशील सूचनाएं एकत्र की जा रही हैं। साथ ही एनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट (ईडी), सीबीआई, फाइनेंशियल इंटेलीजेंस यूनिट (एफआईयू), डायरेक्टोरेट आफ रिवेन्यू इंटेलीजेंस (डीआरआई) एवं रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज (आरओसी) की सेवाएं भी ली जाएंगी। इन एजेंसियों के जरिए विभाग देशभर से भारी भरकम संदिग्ध लेनदेन, हवाला और मुखौटा कंपनियों की गतिविधियों का ब्योरा भी जुटाएगा।

ऐसे होगी छानबीन
किसी भी क्षेत्र की सैटेलाइट इमेज के 'क्लोज व्यू' का पहले लोकल नेटवर्क और भूमि रिकॉर्ड (खसरा नंबर) से मिलान होगा। इसके बाद उस इमेज से संबंधित भूमि के मालिक का नाम-पता लेकर विभागीय अफसर जमीन का भौतिक सत्यापन करेंगे। खसरे में 14 बिन्दुओं की जानकारी रहती है। पंजीयन विभाग से रजिस्ट्री का ब्योरा लेकर भूमि मालिक की आर्थिक स्थिति का आकलन और पिछले 15 साल के रिकॉर्ड की छानबीन होगी। भूमि मालिक की आर्थिक हैसियत का परीक्षण भी होगा। इससे प्रॉपर्टी की असली कहानी सामने आ जाएगी। सैटेलाइट की आंख से आयकर विभाग अब यह जानकारी भी हासिल कर सकेगा कि किसी खेती की जमीन पर कब, कौन-सी फसल ली गई। पिछले वर्षों की इमेज भी सुरक्षित मिल जाएगी। इसी तरह अंदरूनी क्षेत्र में किसी प्रॉपर्टी का वास्तविक क्षेत्रफल क्या है, यह भी सैटेलाइट मिनटों में बता देगा।

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फेस्टिव सीजन खत्म होने पर भी जारी है रियल एस्टेट के खास ऑफर्स । (28 Oct 2017)

दीवाली गुजर चुकी है और यह गुजरी दीवाली भी रियल्टी मार्कीट की मंदी को सुधार नहीं पाई। रियल एस्टेट से जुड़े एक्सपर्ट और डिवैल्पर्स का मानना था कि इतनी स्कीम और छूट के बाद भी अगर दीवाली जैसे सीजन में मार्कीट नहीं सुधरी तो हालात और भी बुरे हो सकते हैं लेकिन फिर भी रियल्टी मार्कीट से जुड़ी कम्पनियों का दावा है कि भले ही दीवाली गुजर गई हो, आने वाले समय में दी जाने वाली रियायतों से रियल्टी मार्कीट में सुधार आएगा। रियल्टी कम्पनियों का दावा है कि भले ही दीवाली को बीते कुछ दिन हो चुके हैं लेकिन फैस्टिव सीजन खत्म नहीं हुआ है। उनके दावों के मुताबिक फैस्टिव सीजन में दिए जाने वाले सभी ऑफर फिलहाल बने रहेंगे ताकि खरीदार आएं। आइए आपको भी बताते हैं कि रियल्टी सैक्टर में किस तरह के ऑफर की भरमार है।

कैश रिफंड
अधिकांश रियल्टी ग्रुप से जुड़े  सैक्टरों ने फैस्टिव सीजन में बड़े फ्लैट्स पर 150-450 प्रति स्क्वेयर फुट तक का कैश डिस्कांऊट दिया या फिर उनके प्लान के तहत फ्लैट बुक कराते हैं तो 50 लाख के फ्लैट पर आपको 5 से 8 लाख तक का डिस्काऊंट मिलता है। यह स्कीम ओमैक्स, अतंरिक्ष ए.टी.एस., सुपरटैक के इकोविलेज सहित कई जगहों पर लागू है। इसके अलावा अगर मौजूदा समय में बिल्डरों ने एक साल की चल रही स्कीम को कैश रिफंड के तहत जोड़ दिया है। इसके तहत रजिस्ट्रेशन और स्टांप ड्यूटी चार्जेस से छूट और फ्री कार पार्किंग आदि के ऑफर हैं।

मॉडयूलर किचन व होलीडे पैकेज
फैस्टिव सीजन में रियल्टी कंपनियां कई तरह के आकर्षक पैकेज भी दे रही हैं। इनके तहत फ्री मॉड्यूलर किचन, मुफ्त टू या फोर व्हीलर, हॉलीडे पैकेज, गोल्ड क्वॉइन, व्हाइट गुड्स आदि शामिल हैं। कम्पनियों का दावा है कि इन ऑफरों से खरीदार के लिए अन्य दिनों की तुलना में 5 से 7 प्रतिशत तक फ्लैट की कीमत कम हो जाती है। हालांकि, कुछ लोगों का दावा है कि बिल्डर्स गिफ्ट के तौर पर दिए जाने वाली इन चीजों की लागत को छुपा कर पहले से ही जोड़ लेते हैं। दूसरी ओर कम्पनियों ने इस दावे को झूठा बताते हुए कैश का प्रावधान रख दिया है जिसके तहत अगर आप किसी स्कीम को नहीं चाहते हैं तो फ्री चीजों के बदले में कैश डिस्काऊंट ले सकते हैं लेकिन तय शर्तों के अनुसार, चीजों के मूल्य की लगभग 50 प्रतिशत रकम ही दी जाती है।

पेमेंट प्लान में बदलाव
पहले डिवैल्पर्स कब्जे पर 10 प्रतिशत भुगतान का प्लान रखते थे और पेमेंट लेट हो जाए तो उस पर 17 से 25 प्रतिशत ब्याज और लेट फाइन भी जोड़ा जाता था लेकिन अब ऐसा नहीं है। मौजूदा समय में फैस्टिव सीजन के तहत अभी 7-8 प्रतिशत का भुगतान करें और बाकी प्रॉपर्टी का कब्जा मिलने पर या कब्जा नहीं मिलने तक कोई मासिक किस्त नहीं जैसे फ्लैक्सिबल पेमेंट प्लान कई डिवैल्पर्स ऑफर कर रहे हैं। जानकारों का कहना है कि इन स्कीमों का मकसद खरीदारों की कैश की ङ्क्षचता को खत्म करना है। हालांकि, ये प्लान सस्ते नहीं होते। सबवैंशन स्कीम का विकल्प चुनने वालों के लिए प्रॉपर्टी की कीमत फुल पेमेंट करने वालों के मुकाबले ज्यादा होती है।

जी.एस.टी. की छूट
कई डिवैलपर्स अपने प्रोजैक्ट्स पर जी.एस.टी. से छूट या कोई जी.एस.टी. नहीं जैसी ऑफर पेश कर रहे हैं। पहली नजर में लगता है कि कि जी.एस.टी. के इस डिस्काऊंट से खरीदार को सीधा 12 प्रतिशत डिस्काऊंट (अंडर कंस्ट्रक्शन प्रोजैक्ट्स पर 12 प्रतिशत जी.एस.टी.) मिलेगा लेकिन ऐसा नहीं है। अगर बिल्डर रजिस्ट्री से पहले इस पैसे को कंस्ट्रक्शन लागत में जोड़ देता है तो इसका लाभ आपको मिलता है अन्यथा नहीं। बता दें कि जी.एस.टी. केवल अंडर-कंस्ट्रक्शन प्रोजक्ट्स पर लागू है जिन्हें ऑक्युपैंसी सर्टीफिकेट (ओ.सी.) नहीं मिला है। लिहाजा, रैडी टू मूव इन प्रॉपर्टी पर जी.एस.टी. माफी के झूठे दावे से न तो बेचा जा सकता है और न ही खरीदा। अगर कोई बिल्डर किसी अंडर कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी पर जी.एस.टी. बैनिफिट ऑफर कर रहा है तो ऐसे में खरीदारों को सावधान रहने की जरुरत है।

 

Source: www.punjabkesari.in


यदि वसीयत नहीं है तो प्रॉपर्टी बाँटने के लिए करें इन कानूनों का पालन। (23 Oct 2017)

नई दिल्लीः हमारे देश में आज भी कम ही लोग अपनी वसीयत बनवाते हैं ताकि उनके निधन के बाद उत्तराधिकार को लेकर किसी तरह का कानूनी विवाद न हो तथा उनके उत्तराधिकारी को भी किसी तरह के विवादों में फंसना न पड़े। आंकड़ों के अनुसार, भारत में 2 प्रतिशत लोग भी वसीयत नहीं बनवाते हैं। केवल अत्यधिक धनाढ्य ही वसीयत बनवाते हैं, क्योंकि उनके विशाल बिजनैस से कई लोग जुड़े हो सकते हैं।  वसीयत न होने पर सम्पत्ति किसकी होगी यदि किसी व्यक्ति का निधन वसीयत किए बिना होता है, तो उत्तराधिकार कानून में तय नियमों के अनुसार उसके पारिवारिक सदस्यों के मध्य उसकी सम्पत्तियों का विभाजन होता है।

-हिन्दू, सिख, जैन या बौद्ध होने पर
यदि व्यक्ति हिन्दू, सिख, जैन या बौद्ध व्यक्ति है, तो उनकी सम्पत्तियों का विभाजन उनके उत्तराधिकारियों के बीच हिन्दू उत्तराधिकार कानून 1956 के तहत होता है।

-क्लास वन उत्तराधिकारी
इस कानून के तहत क्लास वन उत्तराधिकारियों को अन्य उत्तराधिकारियों के मुकाबले प्राथमिकता मिलती है। क्लास वन उत्तराधिकारियों में बेटा, बेटी, विधवा मां, दिवंगत बेटे या बेटी के बेटे या बेटी, विधवा बहू, दिवंगत बेटे के दिवंगत बेटे या बेटी का बेटा, दिवंगत बेटे की विधवा बहू शामिल हैं। वर्ष 2005 में संशोधन के बाद इस सूची में और परिजन जोड़े गए हैं जिसमें दिवंगत बेटी की दिवंगत बेटी का बेटा या बेटी, दिवंगत बेटी के दिवंगत बेटे का बेटा, दिवंगत बेटी की दिवंगत बेटी की बेटी शामिल हैंं।

-क्लास टू उत्तराधिकारी
इनमें 9 श्रेणियां हैं। पिता को श्रेणी एक में रखा गया है जबकि भाई-बहन, पोती का बेटा या बेटी दूसरी श्रेणी में हैं। क्लास दो की तीसरी श्रेणी में नातिन या नाती का बेटा या बेटी आते हैं। गौरतलब है कि क्लास टू की दूसरी तथा तीसरी श्रेणी के 4 उत्तराधिकारी क्लास वन में शामिल हैं। पिता और पोती या नाती के बेटे को क्लास वन में रखा गया है।

-गोद ली संतान मान्य परंतु सौतेली नहीं
इस कानून के तहत भाई और बहन का मतलब विधि सम्मत भाई-बहन है। इसमें गोद ली गई संतानें भी शामिल हैं लेकिन सौतेली नहीं। मरने वाले की मौत के बाद पैदा होने वाली संतान भी विधि संवत मानी जाएगी। बेटी का विवाहित होना या न होना उसके अधिकार में कोई अंतर पैदा नहीं करेगा।

-महिला की वसीयत न होने पर
हिंदू उत्तराधिकार कानून 1956 के तहत यदि किसी महिला की मौत अपनी वसीयत किए बिना हो जाती है, तो उसकी सम्पत्ति के बंटवारे का प्रावधान है। 
इस महिला की सम्पत्ति सबसे पहले बेटे, बेटी और पति में बंटेगी। इनमें उसके दिवंगत बेटे या बेटी की संतानों को भी शामिल किया जाएगा। दूसरे स्थान पर यह बंटवारा पति के उत्तराधिकारियों के बीच होगा। तीसरे स्थान पर महिला के माता-पिता आएंगे। चौथे स्थान पर उसके पिता के उत्तराधिकारी होंगे। अंत में उसकी मां के उत्तराधिकारी होंगे।

-महिला को विरासत में मिली सम्पत्ति पर उत्तराधिकार
अगर महिला को यह सम्पत्ति पति या ससुर से विरासत में मिली है, तो महिला की कोई संतान या दिवंगत संतान के बेटे-बेटी न होने पर सम्पत्ति उसके पति के उत्तराधिकारियों के बीच बंटेगी। सम्पत्ति के विरासत में मिलने से मतलब है कि यह सम्पत्ति उस महिला को बिना वसीयत के किसी उत्तराधिकार में मिली हो, न कि किसी वसीयत अथवा उपहार में मिली हो।

-समान विभाजन
सम्पत्ति विभाजन के मामलों में कानून के तहत बच्चों में भेदभाव नहीं किया जाता है। जैसे कि ऐसा नहीं हो सकता कि फिक्स्ड डिपॉजिट बड़ी बेटी की शिक्षा के लिए दे दिया जाए और कार को उसका ज्यादा प्रयोग करने वाले छोटे बेटे को दे दिया जाए। वसीयत न होने पर सम्पत्तियों को का समान विभाजन होगा। जहां विभाजन सम्भव न हो जैसे कि कार तो उसे बेच कर मिलने वाली रकम को समान रूप से सभी वारिसों को दिया जाएगा। 

-मुस्लिम होने पर 
यदि किसी मुस्लिम व्यक्ति का निधन वसीयत के बिना होता है, तो उसके उत्तराधिकारियों का फैसला मुस्लिम पर्सनल लॉ के आधार पर होगा। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वह मुस्लिम धर्म के किस वर्ग से संबंधित है। इस्लाम में व्यक्ति अपनी कुल सम्पत्ति में से केवल एक-तिहाई की वसीयत कर सकता है। बाकी की दो-तिहाई सम्पत्ति को अनिवार्य रूप से वैध वारिसों में विभाजित करना होता है। शरिया कानून के अनुसार, यह विभाजन इस बात पर निर्भर करता है कि वह ‘बोहरी, मैमन, शिया या सुन्नी’ में से किस वर्ग से संबंधित है।

 

Source: www.punjabkesari.in


लैंड पूलिंग पॉलिसी में हुए बदलाव जल्द मिलेंगे मकान । (13 Oct 2017)

नई दिल्ली
लैंड पूलिंग से जुड़ा नया फैसला गुरुवार को दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल और आवास एवं शहरी कार्यमंत्री हरदीप पुरी के बीच हुई बैठक में लिए गए। बैठक में सचिव दुर्गा शंकर मिश्र भी मौजूद थे। मंत्रालय के एक सीनियर अधिकारी के मुताबिक, इस बैठक में तय किया गया कि डीडीए की भूमिका सुविधा उपलब्ध कराने वाली की होनी चाहिए, इसलिए जमीन के टाइटल के ट्रांसफर की प्रक्रिया को कम करके इस पॉलिसी को लागू होने में लगने वाले वक्त को कम किया जा सकता है। अब जिस जमीन को डिवेलप करना होगा, उसे डीडीए के नाम ट्रांसफर कराने की जरूरत नहीं होगी।

डीडीए उस जमीन पर सुविधाएं विकसित करने के अलावा प्लानिंग भी करेगा ताकि वहां बनने वाले मकान तय मानकों और तय नियमों के मुताबिक बनें। इन सुविधाओं में पार्क से लेकर वे सभी सुविधाएं शामिल होंगी, जो किसी भी रिहाइशी एरिया में होनी चाहिए। इन सुविधाओं यानी सड़कों, पार्क, कम्युनिटी सेंटर के बाद बचने वाली जमीन फिर से जमीन मालिक को दे दी जाएगी ताकि वह वहां मकानों का निर्माण करके उन्हें बेच सके। बैठक में लैंड पूलिंग पॉलिसी के लागू होने में हो रही देरी पर भी चिंता जताई गई। 

इसी पॉलिसी के लिए 89 गांवों को दिल्ली म्युनिसिपल ऐक्ट के तहत शहरी क्षेत्र घोषित करने का कार्य लंबे वक्त से अटका हुआ था। आवास मंत्री ने दिल्ली के उपराज्यपाल को इन गांवों को म्युनिसिपल ऐक्ट के तहत नोटिफाई करने के लिए धन्यवाद करते हुए कहा कि इस अड़चन के दूर होने से अब इस पॉलिसी पर जल्द ही काम होगा।

डीडीए के नाम नहीं होगी जमीन ट्रांसफर 
दिल्ली में लैंड पूलिंग पॉलिसी को लेकर लिए गए नए फैसले के बाद अब इस काम में तेजी आएगी। इस पॉलिसी के तहत जिन किसानों या डिवेलपर की जमीन होगी, वह उनके नाम ही रहेगी, डीडीए को ट्रांसफर नहीं करना पड़ेगा। इस फैसले से दिल्ली में अपने घर का सपना संजोए लोगों को राहत मिलेगी क्योंकि अब प्रक्रिया आसान होने से काम तेजी से किया जा सकेगा। आइए जानते हैं कि आपको इस फैसले से क्या फायदा होगा:

मिलेगा सबको मकान, बसेगा एक नया शहर
 

  • लैंड पूलिंग पॉलिसी में मास्टर प्लान 2021 के तहत आने वाले जोन जे, के1, एल, एन और पी2 जोन शामिल हैं। यहां बनने वाले मकानों के लिए एफएआर 400 देने का फैसला लिया गया है। आमतौर पर यह 150 होता है। सस्ते मकानों को बढ़ावा देने के लिए अतिरिक्त 15 फीसदी एफएआर भी मंजूर किया गया है।
  • इस क्षेत्र में मकानों के निर्माण के लिए 22 हजार हेक्टेयर जमीन उपलब्ध होगी। इससे अनुमान है कि यहां 20 से 25 लाख मकान बनेंगे और उनमें लगभग 95 लाख लोग रहेंगे। इस तरह से आने वाले कुछ सालों में यह क्षेत्र एक और उपनगर के रूप में विकसित होता नजर आएगा।
  • इस पॉलिसी के तहत जितनी जमीन होगी, वह पहले डीडीए को दी जाएगी। इसके बाद डीडीए वहां सड़कें, पार्क आदि की प्लानिंग करेगी और इन कार्यों के लिए जमीन की पहचान की जाएगी। इसके अलावा वहां सीवर लाइन, पेयजल लाइनें आदि बिछाई जाएंगी। उसके बाद बाकी बची जमीन वापस दी जाएगी।
  • मोटे तौर पर यह माना गया है कि अगर जमीन 20 हेक्टेयर है तो उसमें 60 फीसदी जमीन वापस होगी जबकि 40 फीसदी पर जनसुविधाएं विकसित होंगी। इसी तरह से अगर जमीन 2 से लेकर 20 हेक्टेयर है तो 48 फीसदी लैंड वापस होगी। जो 60 फीसदी जमीन वापस होगी, उसमें 53 फीसदी पर आवासीय मकान, 5 फीसदी जमीन पर कमर्शल और 2 फीसदी पब्लिक और सेमी पब्लिक इस्तेमाल के लिए होगी।
  • यहां गरीबों के लिए बनने वाले सस्ते मकान का साइज 32 से 40 मीटर रखना होगा और आधे मकान उस क्षेत्र में कार्य करने वालों के लिए रखने होंगे।
  • डीडीए जो जमीन लेगी, उसमें से कुछ पर वह मकान बनाकर उन्हें बेचेगी। इस तरह से वह अपने खर्चों की भरपाई करेगी।

 

Source: navbharattimes.indiatimes.com


Know whats hidden in real estate festival offers. (09 Oct 2017)

This festive season, it’s been raining offers from the realty sector—no EMI until possession, cash discounts worth lakhs, free modular kitchen, free car, no GST (goods and services tax), the list goes on. However, are these offers genuine or just marketing gimmicks that seek to somehow help real estate developers wade through the sluggishness that has plagued the property market for the past couple of years? “The builders are in a pickle owing to high debt costs, reducing margins and mounting inventories. So, they are coming up with a host of offers to lure customers,” says Akash Bansal, National Head, Consulting, Liases Foras Real Estate Rating & Research.

Before you are lured by the realty offers, it is advisable that you understand these offers. They can be divided into four major categories: Cash or cash equivalent discounts, non-cash discounts, subvention schemes and relaxing GST. Let’s see if the offers really cut down your costs.

Before you are lured by the realty offers, it is advisable that you understand these offers. They can be divided into four major categories: Cash or cash equivalent discounts, non-cash discounts, subvention schemes and relaxing GST. Let’s see if the offers really cut down your costs.

Cash discounts
Here, the monetary value of the offer is clearly stated. It may be cash discounts of Rs 150-300 per sq. ft, or lump sum discounts of Rs 5-6 lakh (for properties valued at around Rs 60 lakh)—no registration and stamp duty charges, free car parking, etc. “These offers are easy to understand and they directly reduce the cost of ownership for the buyer,” says Ankur Dhawan, Chief Investment Officer, PropTiger, a real estate advisory portal. These offers are usually available for a limited period and for a restricted number of units. Limited duration offers such as these can lead to rushed decision making, which may not be in the investors’ best interest. For instance, be wary of the old trick of inflating the base price and then offering a discount. You need to check the prices before the said ‘discount’ was offered.

Also, it is best to not go by the headline. For instance, a discount of Rs 200 per sq. ft may seem attractive on the base price of Rs 5,000 per sq. ft, but it will save you just about Rs 1.2 lakh on a 600 sq. ft flat. Don’t miss out on better offers due to the lure of the headline discount.

Complimentary furniture, gadgets
This category of offers includes free modular kitchen, free two or four wheelers, holiday packages, gold coins, white goods, etc. But are these freebies really free? Experts say the overall cost of any such offer is directly or indirectly included in the price of the home. “Builders usually increase the basic price to offer such deals,” says Manoj Agarwal, Founder, Agarwal Estates. Some developers may also be offering genuine deals, but they will amount to just about 1-8% of the property cost. Further, you have no say on the type and quality of the products being offered.

So, it is best to ask the developers for a cash discount instead—you can use the money saved whichever way you want to. However, often when buyers ask for cash discount in lieu of free goods, they sum they are offered is about 50% of the value of the freebie being offered. “This is because the cost of the goods being offered is much less for the builder as he buys them in large numbers,” says Agarwal. However, despite lower cash discounts compared to the value of goods, it may be better to opt for the discount, which will help generate better returns on your realty investment. While property may or may not appreciate in value, the value of these free goods will only depreciate over time. “No doubt freebies have superficial attraction, but one should consider whether what’s being offered is frivolous or actually adds to the value of the property, or improves one’s savings on its purchase,” says Anuj Puri, Chairman, Anarock Property.

Easy payment plans
Pay only 7-8% now and the rest on possession of the property, or no EMI until possession. A lot of developers are offering such flexible payment plans. Experts say the objective of these schemes is to address the liquidity concerns of buyers and help them stagger their payments. But these plans don’t come cheap. The price of the property for buyers who intend to opt for the subvention scheme is higher compared to those who make the full payment. “The price differential can range between Rs 500 and Rs 1,000 per sq. ft,” says Siddharth Goel, Senior Director, Research, India, Cushman & Wakefield. So, you must evaluate the higher price of the property under a subvention scheme and the up front discount that you can avail if you make the full payment.

You should also check if subvention schemes are time-bound—balance sum to be paid at the end of specific tenure—or possession-bound—balance payment at the time of possession. “It is advisable to opt for a possession-bound scheme as it will help buyers prolong their payment further and avail maximum room for arranging liquidity,” says Goel.

Some developers also offer interest subvention schemes where they take on the responsibility of paying the interest during the construction phase. This scheme also comes with a higher basic property price. Others offer to service part of the buyer’s interest—if the bank is charging 9%, the builder offers to pay 4% of the interest during the subvention period. “Such a scheme actually helps the developers more as it allows them to raise funds at a lower cost (4-7%) and save on borrowing from financial institutions, which at 11-12%,” says Vikram Goel, CEO, HDFC Realty. So, you need to carefully evaluate whether a subvention plan works in your favour.

GST waivers
A number of developers are advertising waiver of GST or no GST on their projects. While this looks like a straight 12% discount (GST on under construction projects is levied at 12%), these advertisements can be misleading. “The GST is applicable and levied only on under-construction projects that have not received occupancy certificate (OC),” says Goel. So, a ready-to-move-in property cannot be sold with a false claim of ‘GST waived’.

In case a builder is offering some GST benefit on an under-construction property, buyers must ascertain whether or not the property has received an OC. Also, property prices, pre-OC and post-OC must be compared. The pre-OC price includes GST and if the post-OC price is also the same or a little less, that means the whole benefit of GST is not extended to the buyer. “Builders usually do not reduce the price once the OC comes in. So, you must ask for the price break-up to know the real discount,” says Agarwal. “You should also compare the GST waiver with any discount given to existing customers. Only if the waiver is higher than discount offered to an existing customer, it can be treated as a special scheme,” says Dhawan.

 

Source: economictimes.indiatimes.com


त्यौहार में खरीदें अपना मकान बैंक दे रहे है ऑफर। (06 Oct 2017)

नई दिल्लीः फेस्टिव सीजन में घर खरीदना शुभ माना जाता है। अगर आप भी घर खरीदने के बारे में सोच रहे हैं तो घर खरीदने का यह सही समय है। इस फेस्टिव सीजन में बैंकों ने होम लोन पर ऐसे खास ऑफर निकाले हुए हैं जिनका फायदा आप पूरे फेस्टिव सीजन के दौरान उठा सकते हैं।

SBI का नया ऑफर
देश के सबसे बड़े बैंक एस.बी.आई. ने फेस्टिव सीजन को ध्यान में रखते हुए एक खास ऑफर निकाला हुआ है। हमारा घर नाम के इस ऑफर के तहत 30 लाख रुपए का होम लोन लेने वालों से 8.35 फीसदी की दर से दो साल के लिए फिक्सड रेट तय किया है। इसके अलावा अगर कोई लोन के ऊपर टॉप-अप लेता है तो फिर उसको भी इसी रेट पर ब्याज देना होगा। वहीं इस ऑफर के तहत लोन अप्लाई करने पर किसी तरह की कोई प्रोसेसिंग फीस नहीं लगेगी।

ICICI की कैशबैक स्कीम
आई.सी.आई.सी.आई. बैंक ने नकदी की अधिकता के बीच अपने होम लोन लेने वालों ग्राहकों के लिए नई कैशबैक योजना पेश की है। इस पेशकश के तहत लोन लेने वालों को उनकी मासिक किस्त पर 1 प्रतिशत कैशबैक मिलेगा। बैंक के मुताबिक इस योजना के तहत अगर कोई ग्राहक 30 साल की अवधि के लिए लोन लेता है तो उसे इस अवधि में मूलधन का 11 प्रतिशत तक वापस मिल सकता है। हालांकि, बैंक ने कहा कि यह योजना सिर्फ नया होम लोन लेने वालों के लिए है।

एक्सिस बैंक
एक्सिस बैंक होम लोन पर 12 ई.एम.आई. माफ किए हुए है। 30 लाख तक के लोन पर जो भी कस्टमर लोन के रिपेमेंट पर किसी तरह का कोई डिफॉल्ट नहीं करेगा, उसकी 12 ई.एम.आई. बैंक माफ कर देगा। इस लोन पर 8.35 फीसदी ब्याज लगेगा। अगर आप 30 साल के लिए लोन लेते हैं तो फिर आप 3 लाख रुपए इस ऑफर के तहत बचा सकेंगे।

 

Source: www.punjabkesari.in


प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 9 बड़े राज्यों में बनेंगे मकान । (04 Oct 2017)

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत गांवों में मकान बनाने की योजना का सबसे ज्यादा फायदा 9 बड़े राज्यों को मिलेगा। वर्ष 2019 तक एक करोड़ मकान बनाने के लक्ष्य में से 84 लाख मकान (84 फीसदी) इन्हीं राज्यों में बनेंगे। सर्वाधिक 16 लाख 29 हजार आवास बिहार में बनाए जाएंगे।

चुनाव वाले राज्यों पर सरकार का जोर
उत्तर प्रदेश दूसरे नंबर पर है जहां 11.98 लाख मकान बनाए जाने हैं। फिलहाल उन राज्यों पर विशेष जोर है जहां अगले साल चुनाव होने हैं। तय लक्ष्य को पूरा करने में मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों की रफ्तार तेज है। इन सभी राज्यों में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा तेजी से मकान बन रहे हैं।

इनका प्रदर्शन बेहतर 
केंद्र की अंदरूनी रिपोर्ट में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश और हिमाचल प्रदेश का प्रदर्शन अच्छा है। शुरूआत में यू.पी. और बिहार की रफ्तार बेहद सुस्त थी लेकिन अब लय पकड़ रहे हैं। केंद्र ने सुस्त रहे राज्यों की विशेष तौर पर निगरानी शुरू की है।

इन सुविधाओं से होगा आदर्श 
इन मकानों में उज्ज्वला योजना से मुफ्त गैस और बिजली का कनैक्शन आदि भी दिए जा रहे हैं। केंद्र की मंशा है कि जो भी आवास बनें उन्हें आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया जा सके। मकानों में शौचालय के निर्माण और उपयोग के लिए थर्ड पार्टी सर्वे कराने की भी योजना है।

इसलिए बिहार ने मारी बाजी
लाभाॢथयों के चयन के मामले में बिहार ने बाजी मार ली है। ग्रामीण विकास मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि 2 चीजें अहम रही हैं। एक तो राज्य का समय से प्रस्ताव भेजना। दूसरा राज्य के आकार के मुताबिक उसकी जरूरतें। बिहार में ज्यादा लोगों को मकान की जरूरत है। शुरू में बिहार से करीब 80 लाख आवास बनाने का प्रस्ताव मिला था। कई राऊंड की छंटनी के बाद संख्या 63 लाख से ज्यादा घट गई। यू.पी. बड़ा राज्य है। लेकिन बिहार के मुकाबले यहां कम लाभार्थियों का प्रस्ताव केंद्र को मिला।

इन 9 राज्यों से तय होगा 84 फीसदी लक्ष्य

बिहार

16.29 लाख

यू.पी.

11.98 लाख

मध्यप्रदेश

11.77 लाख

प. बंगाल

11.32 लाख

ओडिशा

10.29 लाख

राजस्थान

6.75 लाख

छत्तीसगढ़ 

6.23 लाख

झारखंड

4.80 लाख

महाराष्ट्र

4.56 लाख

 

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रियल्टी क्षेत्र में बढ़ रही नौकरियां । (29 Sep 2017)

नई दिल्ली: रियल्टी क्षेत्र में 2025 तक 80 लाख नई नौकरियां मिलेंगी और इस क्षेत्र में कुल श्रमबल की संख्या 1.7 करोड़ पर पहुंच जाएगी। रियल्टी कंपनियों के प्रमुख संगठन क्रेडाई और सलाहकार सी.बी.आर.ई. की संयुक्त रिपोर्ट ‘भारत के रियल एस्टेट क्षेत्र के आर्थिक प्रभाव का आकलन’ में यह अनुमान लगाया गया है। रिपोर्ट कहती है कि नए रियल एस्टेट नियामकीय कानून तथा वस्तु एवं सेवा कर (जी.एस.टी.) जैसी पहलों से यह क्षेत्र आगे बढ़ेगा। इसमें कहा गया है कि देश के सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) में रियल एस्टेट क्षेत्र का हिस्सा 2025 तक दोगुना होकर 13 प्रतिशत हो जाएगा। रिपोर्ट के अनुसार 2025 तक रियल एस्टेट क्षेत्र में रोजगार की संभावनाएं बढ़कर 1.72 करोड़ पर पहुंच जाएंगी जो अभी 92 लाख हैं।

इस दौरान जी.डी.पी. में रियल एस्टेट क्षेत्र का योगदान मौजूदा के 6.3 प्रतिशत से उल्लेखनीय रूप से बढ़कर 13 प्रतिशत हो जाएगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि क्षेत्र के लिए दीर्घावधि की संभावनाएं काफी सकारात्मक हैं। क्रेडाई के अध्यक्ष जैक्सी शाह ने कहा कि सकारात्मक जनसांख्यिकी और नियमन वाले माहौल की वजह से देश की अर्थव्यवस्था में रियल्टी क्षेत्र का योगदान उल्लेखनीय रूप से बढ़ेगा।

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Public-Private Partnership (PPP) policy for affordable housing to provide cheap houses (22 Sep 2017)

MUMBAI: Taking its efforts to achieve ‘Housing for All by 2022’ to another level, the central government has announced a new public-private partnership (PPP) policy for affordable housing that allows extending central assistance of up to Rs 2.50 lakh per house to be built by private builders even on private lands. 

Under this policy announced by Minister of Housing & Urban Affairs Shri Hardeep Singh Puri, eight PPP (Public Private Partnership) models have been provided for the private sector to invest in the affordable housing segment. It has also opened the potential for private investments in affordable housing projects on government lands in urban areas. 
 

While addressing real estate body NAREDCO’s summit, Puri explained that this policy seeks to assign risks among the government, developers and financial institutions, to those who can manage them the best, besides leveraging under-utilised and unutilised private and public lands towards meeting the target of Housing for All. 

“We are not being prescriptive or restrictive with these models. Land being a state subject, the governments can come up with more models that would help in pushing affordable housing efforts further,” Puri said. The two PPP models for private investments in affordable housing on private lands include extending central assistance of about Rs 2.50 lakh per house as interest subsidy on bank loans as upfront payment under the Credit Linked Subsidy Component (CLSS) component of Pradhan Mantri Awas yojana (Urban). Under the second option, central assistance of Rs 1.50 lakh per house to be built on private lands would be provided, in case the beneficiaries do not intend to take bank loans. 

Puri stated that eight PPP options, including six for promoting affordable housing with private investments using government lands, have been evolved after extensive consultations with the states, promoter bodies and other stakeholders. 

The six models using government lands are: 

1.DBT Model: Under this option, private builders can design, build and transfer houses built on government lands to public authorities. Government land is to be allocated based on the least cost of construction. Payments to builders will be made by the public authority based on progress of project as per agreed upon milestones and buyers will pay to the government. 

2. Mixed-Development Crosssubsidized Housing: Government land to be allotted based on number of affordable houses to be built on the plot offered to private builders, cross subsidizing this segment from revenues from high-end house building or commercial development. 

3. Annuity-Based Subsidized Housing: Builders will invest against deferred annuity payments by the government. Land allocation to builders is based on unit cost of construction.

4. Annuity-cum-Capital Grant Based Affordable Housing: Besides annuity payments, builders could be paid a share of project cost as upfront payment. 

5. Direct Relationship Ownership Housing: As against government mediated payments to builders and transfer of houses to beneficiaries in the above four models, under this option, promoters will directly deal with buyers and recover costs. Allocation of public land is based on unit cost of construction. 

6. Direct Relationship Rental Housing: Recovery of the costs by builders is through rental incomes from the houses built on government lands.

 
Source: economictimes.indiatimes.com


Festive season bonanza for home buyers NBCC will launch flats for sale. (21 Sep 2017)

NEW DELHI: State-owned construction firm NBCC will launch about 1,000 flats for sale in this festival season and is in discussion with the government to develop affordable housing projects on surplus land with PSUs. 

The company is also in talks with the government for developing islands in Andaman and Nicobar and Lakshadweep, its Chairman and Managing Director Anoop Kumar Mittal said. 

"We have been appointed as land management agency for the surplus land with sick PSUs. We are in close discussion with the government to develop affordable housing projects on some of the land parcels," he told reporters. 
 

On developing island, Mittal said the company has experience in developing islands in Maldives and expects to bag similar projects in India. 

"We will be launching 1,000 flats as well as commercial area across the country including Delhi-NCR in this festival. The flats will be in the price range of Rs 15 lakh to Rs 1 crore," he said. 

Asked about taking over stressed projects of Jaypee Infratech and Amrapali, he said the company has not received any offer from any stakeholder including buyers, builders or the government. 
 

However, he said the company would certainly consider if there is any opportunity, provided projects should be viable and not bring bad name to the NBCC. On land purchase from Air India, Mittal said the company had signed an MoU with Air India for monetisation of surplus land assets of the national carrier, but there has not been much progress. 
 

However, the CMD said that the company has recently bought a land parcel from Air India in Mauritius for Rs 3 crore. Two years back, it had bought another land parcel from Air India in Coimbatore for Rs 25 crore.  Mittal said two land parcels in Vasant Vihar and Baba Kharag Singh Marg in Delhi were given on lease to Air India by the government and the same is being returned to the Ministry of Housing and Urban Affairs. 
 

 

Source: economictimes.indiatimes.com


दिल्ली में प्रॉपर्टी की कीमतें रहेंगी कम । (19 Sep 2017)

नई दिल्ली
अगले तीन महीनों में दिल्ली के ज्यादातर इलाकों में प्रॉपर्टी की कीमतें घटने की उम्मीद है। पिछली कई तिमाहियों से जारी मंदी धीरे-धीरे थम तो रही है, लेकिन राजधानी के प्राइम लोकेशन और प्रीमियम प्राइस रेंज में कीमतों को सपॉर्ट नहीं मिल पाया है। साउथ दिल्ली के ज्यादातर पॉश इलाकों में फ्लैटों के दाम एक तिमाही में 3-4 पर्सेंट और पिछले एक साल में 5 से 15 पर्सेंट तक घटे हैं। हालांकि तिलकनगर, उत्तम नगर, गोविंदपुरी, राजौरी गार्डन, लक्ष्मी नगर जैसे मिडल क्लास एरिया में कीमतें ऊपर का रुख कर रही हैं, जहां आगे भी पॉजिटिव रुझान देखा जा रहा है।

रियल एस्टेट पोर्टल मैजिकब्रिक्स के सिटी प्रॉप इंडेक्स में यह बात सामने आई है। राजधानी के 68 इलाकों में प्रॉपर्टी के प्रतिवर्ग फुट औसत कीमत के आधार पर कहा गया है कि सफदरजंग एन्क्लेव, साकेत, ग्रेटर कैलाश-1, चितरंजन पार्क, आईपी एक्सटेंशन, वसंत कुंज में कीमतें 3-4 पर्सेंट तक और घट सकती हैं, वहीं तिलक नगर, उत्तम नगर, गोविंदपुरी, राजौरी गार्डन, लक्ष्मी नगर में 4 पर्सेंट तक बढ़ोतरी का अनुमान है। पहली तिमाही में कीमतें सफदरजंग एनक्लेव में सबसे ज्यादा 26%, ग्रेटर कैलाश-1 में 6%, चितरंजन पार्क 5%, वसंत कुंज 2% और द्वारका मोड़ में 3% तक गिरी हैं। टॉप टेन प्रीमियम इलाकों में एक साल में औसतन 15 पर्सेंट की गिरावट दर्ज की गई है। मेट्रो विस्तार और इन्फ्रास्ट्रक्चर के कई प्रॉजेक्ट्स को मंजूरी मिलने से 10,000 रुपये प्रति वर्गफुट से ऊपर के बजट और मिड रेंज में कीमतें ऊपर का रुख कर रही हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि दिल्ली में RERA के नोटिफाई होने और लैंडपूलिंग पर वैधानिक मंजूरियों से रियल एस्टेट के लिए उत्साहजनक माहौल बना है। मस्जिद विहार से शिव विहार तक 59 किलोमीटर लंबे मेट्रो पिंक लाइन के अप्रैल 2018 तक तैयार होने और 7 किलोमीटर लंबी शकूरपुर-मायापुरी लाइन बनने से रिंग रोड के समानांतर साउथ, नॉर्थ और ईस्ट दिल्ली की कनेक्टिविटी काफी बढ़ जाएगी। इससे इन इलाकों में प्रॉपर्टी कीमतों में तेजी आनी शुरू होगी। 

दिल्ली में अब 1.5 लाख वर्गमीटर से कम एरिया में निर्माण के लिए केंद्रीय पर्यावरण एजेंसी से मंजूरी के बजाय डीडीए और निगम के कंस्ट्रक्शन परमिट के साथ ही यह मंजूरी दिए जाने से नए बिल्डरों का उत्साह भी बढ़ेगा। यूनिफाइड ट्रैफिक ऐंड ट्रांसपोर्टेशन इन्फ्रास्ट्रक्चर प्लानिंग ऐंड इंजीनियरिंग सेंटर (यूटिपेक) को भी कई प्रॉजेक्ट्स की मंजूरी मिली है। मथुरा रोड भैरों मार्ग रोड निर्माण, मोदी मिल फ्लाईओवर, डीएनडी और आश्रम फ्लाईओवर के विस्तार जैसे कई बुनियादी ढांचों पर काम हो रहा है। जानकारों का कहना है कि डीडीए की 12,000 फ्लैटों की स्कीम में ग्राहकों दिलचस्पी घटने से यह धारणा बढ़ी है कि लोग अफोर्डेबल के साथ ही क्वॉलिटी हाउसिंग चाहते हैं।

 

Source: navbharattimes.indiatimes.com


ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी करेगी अटके प्रॉजेक्ट्स का फिजिकल और फाइनैंशल ऑडिट। (16 Sep 2017)

नोए़डा
ग्रेटर नोएडा में जितने भी बिल्डर प्रॉजेक्ट्स का काम रुका हुआ है, वहां पजेशन कब तक मिलेगा, इसके लिए बायर्स को अभी तीन महीने इंतजार करना होगा। अथॉरिटी या प्रदेश सरकार बायर्स को कोई भी आश्वासन देने से पहले ऐसे प्रॉजेक्ट्स का फिजिकल और फाइनैंशल ऑडिट कराएगी। ऑडिट करने वाली कंपनी के चयन के लिए अथॉरिटी एक-दो दिनों में टेंडर जारी कर इस महीने के अंत तक कंपनी का चयन कर लिया जाएगा।

ग्रेटर नोएडा और ग्रेटर नोएडा वेस्ट में करीब 50 बिल्डर प्रॉजेक्ट्स का काम ठप है। इस प्रॉजेक्ट्स से जुड़े खरीदार पिछले कई महीनों से बिल्डर, अथॉरिटी और सरकार से पूछ रहे हैं कि उन्हें फ्लैट कब तक मिलेगा। इस सवाल का जवाब बायर्स को तीन महीने बाद ही मिल पाएगा। ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी के सीईओ देबाशीष पंडा ने बताया कि जिन बिल्डर प्रॉजेक्ट्स के काम रुके हुए हैं, उन सभी का फाइनैंशल और फिजिकल ऑडिट कराया जाएगा। इससे यह पता चल सकेगा कि बिल्डर ने प्रॉजेक्ट में निवेश करने वालों के पैसे कहां लगाए हैं। अगर उसी प्रॉजेक्ट में लगाए हैं तो प्रॉजेक्ट अब पूरा क्यों नहीं हुआ। 

सीईओ का कहना है कि ऑडिट से ही बिल्डरों की हकीकत सामने आएगी। ऑडिट रिपोर्ट मिलने के बाद ही अथॉरिटी या सरकारी स्तर पर प्रॉजेक्ट को पूरा कराने से संबंधित कोई फैसला लिया जा सकेगा।ऑडिट कराने के लिए कंसल्टेंट की नियुक्ति अथॉरिटी की ओर से की जाएगी। इसके लिए एक-दो दिनों में टेंडर जारी कर दिया जाएगा। सीईओ ने बताया कि इस महीने के अंत तक कंसल्टेंट की नियुक्ति कर ली जाएगी। अगले महीने के पहले हफ्ते से अटके हुए बिल्डर प्रॉजेक्ट्स का ऑडिट शुरू करा दिया जाएगा। इस लिस्ट में आम्रपाली ग्रुप के प्रॉजेक्ट्स टॉप पर हैं। सबसे पहले इसी ग्रुप के प्रॉजेक्ट्स का ऑॅडिट किया जाएगा।

 

Source: navbharattimes.indiatimes.com


Builders give home buyers one deadline and RERA another to avoid penalty. (14 Sep 2017)

Builders are pushing back the date of delivery of flats to buyers by several months and even years as a result of the new real estate law in the state. This has put many buyers in a bind because their agreements of sale with the builders mention a much earlier date. 

Developers registering projects with the Maharashtra Real Estate Regulatory Authority (MahaRera) are mandated to declare the delivery date of projects. There are penalties if they delay beyond the date submitted. 

People who have booked flats in projects across the city and in Pune have complained that their builders had committed to handing over the apartments in, say, 2017 and 2018. However, during registration, the developers have shown the date of possession as 2021-22.

Real estate observers say builders have intentionally pushed back the date to allow themselves a buffer in case the project gets stuck for some reason. Many builders are giving project completion deadlines to MahaRera which are different from the ones they have promised flat buyers. Developer Boman Irani, vice-president of MCHI-CREDAI which represents builders, said the date of delivery mentioned during Rera registration is “acceptable.“ 

“Builders are keeping a margin of six months to one year for possession. The date submitted to Rera to hand over possession is the final cut-off.But developers will deliver much before this date,“ he said. 

MahaRera chairman Gautam Chatterjee, however, warned that builders will have to pay penalties for delays beyond what is stipulated in the registered agreement for sale. “It (possession date) will not be based on the date submitted as the revised date at the time of registering the project with us,“ he said. 

A director of a global firm, who booked an apartment in Kandivli, told TOI his builder was to deliver his flat in December 2017. “But in the Rera declaration he has given date of possession as April 2019,“ he said.“They have no respect for commitment. If he fails to deliver in December 2017, I cannot complain to the authority for the delay,“ he added. 

Another buyer said many like him will now have to “recalibrate their finances“ because developers have suddenly changed the goal post. 

In a Chembur project by a prominent developer, a source said, the developer has extended the delivery date from December 2017 to 2022. “The contract has a different date while date submitted to Rera has a different timeline,“ he said. Similarly, the deadline for a redevelopment project in the eastern suburbs has been pushed back from 2017 to 2022.

But the most extreme case is that of a developer in Bandra (E), who has given the possession date of 2025 although he started the project in 2010 and promised delivery in 2014. 

 

Source: economictimes.indiatimes.com


खाली पड़े फ्लैट का किराया देगा OYO-ROOMS। (07 Sep 2017)

नई दिल्लीः अगर आप भी अपने खाली पड़े फ्लैट को लेकर चिंतित हैं तो जल्द ही आपकी परेशानी दूर हो सकती है। जी हां, होटल बिजनेस में अच्छा खासा नाम कमा चुके ओयो की नजर अब ऐसी प्रॉपर्टीज पर है जो खाली पड़ी है। इसमें आवासीय अपार्ट्समेंट्स भी शामिल हैं। सॉफ्टबैंक की फंडिंग वाला होटल स्टार्टअप ओयो ने घर मालिकों से बात की है और वह उनके घर को 'मिनी होटल रुम्स' में बदलने की तैयारी में है जिसे मेहमानों के लिए किराए पर दिया जा सके। बता दें कि कंपनी ने गोवा में इसकी तैयारी शुरू कर दी है जल्द ही पूरे देश में इसे लाया जाएगा।

मिलेगी ये सुविधाएं
ओयो के फाउंडर और सीईओ रितेश अग्रवाल ने कहा, 'हमारे इस नए वेंचर में कोई केयरटेकर नहीं होगा।' ओयो की तरफ से एक हेल्पर गेस्ट को चेक-इन कराएगा और वह बाकी सभी सहायता के लिए भी उपलब्ध होगा। उन्होंने कहा कि इन सभी घरों में वाई-फाई कनेक्शन, एसी कमरे, फ्लैट स्क्रीन टीवी, किचन पहले से ही सामान से भरी होगी और मनोरंजन के लिए गेम्स भी होंगे। इन घरों में आपको होटल की तरह नाश्ता नहीं मिलेगा क्योंकि सामान से भरी हुई किचन दी जाएगी।

 

Source: www.punjabkesari.in


Yamuna Expressway Industrial Development Authority (YEIDA) to provide 3,000 Affordable homes (30 Aug 2017)

GREATER NOIDA: Yamuna Expressway Industrial Development Authority (YEIDA) on Tuesday said that it would hand over possession of 2970 flats in its affordable group housing plan located in sector 22D of the YEIDA area. The authority has built a total of 5100 flats for middle and low income groups. These residential flats have also received a ‘green’ certification from the Indian Green Building Council.

According to officials, the multi-storey flats were launched through two different schemes in 2013-14. “Allottees will be able to take over the possession of the flats and register their property within 60 days,” said Shailender Bhatia, Officer on Special Duty, (OSD), YEIDA. “The owners of rest of the flats will also be handed over the possession in a phased manner,” he said.

Officials further said that the flats are ready for living. These affordable homes were designed in a way so as to cater to all sections of society. Plots size of flats is 30 sq m each. “The multi-storied apartments, which also have stilt parking facilities, were sold at an affordable rate of Rs 7.5 lakh per unit for 1BHK, officials said.

“They are environment-friendly affordable homes,” said Arun Vir Singh, CEO, YEIDA. “These homes will promote health, conserve natural resources, provide easy access to       services and save residents hundreds of rupees a year in energy costs,” he said.

 

 

Source: www.economictimes.indiatimes.com


Jaypee Infratech Case: No refund to home buyers, project may continue. (22 Aug 2017)

NEW DELHI: The insolvency resolution professional (IRP) handling the Jaypee Infratech case has ruled out the possibility of home buyers getting refunds, but has assured efforts are being made to ensure the continuation of project development. 

The Allahabad bench of the National Company Law Tribunal (NCLT) on August 9 classified Jaypee Infratech as insolvent on the petition filed by IDBI BankBSE -0.65 % under Section 7 of Insolvency and Bankruptcy Code 2016. 

According to the order, Jaypee Infratech has defaulted on Rs 526.11-crore loan outstanding to IDBI Bank. The latest move by NCLT against Jaypee Infratech has left around 32,000 home buyers in the lurch. NCLT has now appointed Anuj Jain as the IRP to carry out the proceedings under the Insolvency and Bankruptcy Code, while the board of directors of the company will remain suspended. 

In an FAQ released on Thursday, Jain requested home buyers to at least submit the form by August 24, while the supporting documents can be provided subsequently, but before a resolution plan is filed. 

IRP also clarified that the August 24 deadline for submitting of claims by home buyers will not be extended. “The IRP has made no statement or commitment to any authorities or media representative suggesting that refund can be made to certain categories of flat buyers/projects," Jain clarified on Friday on some of the media reports. IRP made it clear it is not a proceeding for Jaypee Infratech’s liquidation. "This is a process during which steps are explored for restructuring of the company," he said. 

The professional also clarified that the company’s operations are being continued as a going concern and there would not be any disruption in its day-to-day operations. 

A total of 27 projects in three Noida land parcels of Jaypee Infratech will come under the purview of the Corporate Insolvency Resolution Process (CIRP), according to another FAQ released on Friday. 

IRP will now come up with a resolution plan, which will have to be approved by the committee of creditors (CoC), including financial institutions, public sector banks and other lenders. 

The CoC is likely to be set up by September 9. IRP will get 270 days to turn around the company's finances and see if a resolution of the company’s debt is possible. In case this is not possible, the company's asset will be liquidated.

 

Source: www.economictimes.indiatimes.com


 


Delhi High Court Dismisses NDMC bylaws relieved property owners (19 Aug 2017)

NEW DELHI: Delhi High Court has struck down New Delhi Municipal Council (NDMC) bylaws of 2009, as per the laws the property tax was charged for the vacant land. With the dismissal of NDMC bylaws property owners seems reliefed.

A bench of Justice S Muralidhar and Justice Pratibha M Singh also “invalidated” the action taken by the civic agency under the new bye-laws, which had brought about a change in the method of arriving at the rateable value for the purposes of property tax.

The court’s direction came on a batch of 28 writ petitions filed in the last few years by group of individuals, corporates and residents welfare associations alleging that under the 2009 NDMC bye-laws, the civic body was charging property tax on vacant land at a rate equal to the constructed area.

The petitioners argued that such amendment to bye-laws was carried out despite the fact that in a large portion of the NDMC area, no construction is permitted on vacant land due to the Lutyen’s Bungalow Zone restrictions or Archaeological Survey of India regulations. Hence the owners argued they can’t be penalised for not doing something which is prohibited under law.

Allowing the petitions challenging the constitutional validity of these bye-laws, the bench said it “invalidates all actions taken by the NDMC under the new bye-laws in terms of levy, assessment, collection and enforcement of demand of property tax. All property demands made under the new bye-laws are hereby invalidated and declared unenforceable.”

It further said that in terms of the interim order passed by the court, the excess of the tax deposited has to be refunded but exact amount can be determined only as per the existing rules under the NDMC Act.

“Such refund of excess tax deposited would be in accordance with the law and together with the interest payable thereon in terms of the NDMC Act. It will be open to the individual tax payers to seek appropriate remedies in regard to refund together with interest at the appropriate stage after completion of the assessment in terms of the extant provisions of the NDMC Act,” the bench said in its 40-page order.

 

Source: www.economictimes.indiatimes.com


नोएडा में प्रॉपर्टी लेकर फंसे लोगों को अरुण जेटली का सुझाव दिवाला कानून के तहत करे अपील । (17 Aug 2017)

नई दिल्ली
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने नोएडा में प्रॉपर्टी लेकर फंसे लोगों पर टिप्पणी की है। अरुण जेटली ने कहा है कि नोएडा के विरोध प्रदर्शन कर रहे घर के खरीदारों से सरकार की पूरी सहानुभूति है और ऐसे लोग दिवाला कानून के तहत राहत के लिए अपील भी कर सकते हैं। राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) की इलाहाबाद पीठ ने पिछले सप्ताह जेपी इन्फ्राटेक के खिलाफ 526 करोड रुपये के लोन चूक मामले में आईडीबीआई की याचिका कार्यवाही के लिए दाखिल कर ली है।

इससे फ्लैट बुक कराने वाले हजारों लोगों के समक्ष अनिश्चितता पैदा हो गयी है। एनसीएलटी ने अंतरिम निपटान पेशेवर (आईआरपी) अनुज जैन को दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता के तहत प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए नियुक्त किया है। जेटली ने कहा कि जिन भी लोगों ने डिवेलपर्स को पैसा दिया है उन्हें उनके फ्लैट मिलने चाहिए। वित्त मंत्री ने कहा कि घर के खरीदारों से हमारी पूरी सहानुभूति है। उन्होंने कहा कि दिवाला संहिता के तहत कंपनी के कारोबार को चालू रखने का भी एक प्रावधान है।

केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक के बाद जेटली ने नोएडा के घर के खरीदारों के समक्ष आ रही दिक्कतों पर पूछे गए सवाल पर कहा, 'जो परेशान हैं वे इस कानून के तहत राहत के लिए जा सकते हैं। यदि इस तरह का कोई कदम होता है तो सरकार की पूरी सहानुभूति उन लोगों के साथ होगी जिन्होंने फ्लैट बुक कराने के लिए पैसा दिया है।' कर्ज के बोझ से दबे जेपी समूह की कंपनी जेपी इन्फ्राटेक ने आईडीबीआई के 526.11 करोड़ रुपये के लोन के भुगतान में चूक की है। यह कंपनी सड़क निर्माण और रीयल एस्टेट क्षेत्र में कारोबार करती है। इसी कंपनी ने दिल्ली को आगरा से जोड़ने वाले यमुना एक्सप्रेसवे का निर्माण किया है।
 

 

Source: www.navbharattimes.indiatimes.com
 


उच्चतम न्यायालय का फैसला सुपरटेक को देने होंगे 10 करोड़ रुपये। (16 Aug 2017)

नई दिल्लीः उच्चतम न्यायालय ने रियल इस्टेट कंपनी सुपरटेक को निवेशकों का पैसा वापस करने के लिए 10 करोड़ रुपए जमा करने के आज निर्देश दिए। इस राशि का इस्तेमाल नोएडा में बन रही एमेराल्ड टावर्स परियोजना में बने रहने को अनिच्छुक उपभोक्ताओं का पैसा लौटाने में किया जाएगा। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति एएम खनविलकर की खंडपीठ ने सुपरटेक को कहा कि वह 22 सितंबर तक शीर्ष न्यायालय की रजिस्ट्री में 10 करोड़ रुपए जमा करे। खंडपीठ ने कंपनी के वकील सलमान खुर्शीद के राशि कम करने के अनुरोध को खारिज कर दिया।

क्या कहा खंडपीठ ने
खंडपीठ ने कहा कि यह जमा राशि निवेशकों को समानुपातिक आधार पर लौटाई जाएगी। पीठ ने कहा, ‘‘ये लोग कितने मामले दर्ज कराएंगे? इन्होंने एक घर पाने के लिए अपना जीवन और अपनी कमाई खर्च कर दी है।’’ सुनवाई के दौरान कंपनी की तरफ से खुर्शीद ने कहा, ‘‘हमने निवेशकों को पहले ही 107 करोड़ रुपए लौटा दिए हैं। 10 करोड़ रुपए और जमा करना बहुत अधिक हो जाएगा।’’ जमा कराए जाने वाली राशि कम करने का अनुरोध करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘यह एक ऐसी कंपनी है जिसने परियोजनाओं को समय पर पूरा किया है। पिछले साल और इस साल भी हजारों फ्लैट लोगों को दिए गए हैं।’’ इस पर खंडपीठ ने कहा, ‘‘आपका निर्माण हो सकता है पूरा हो गया हो पर नियमों का उल्लंघन हुआ होगा। ये लोग इसी कारण परियोजना में बने नहीं रहना चाहते हैं।’’ खंडपीठ ने आगे कहा, ‘‘आप पहले पैसे जमा करिए, फिर हम देखेंगे कि क्या किया जाना चाहिए।’’

सबसे पहले वापिस किया जाएगा मूल धन
न्यायालय ने कहा कि सबसे पहले निवेशकों का मूल धन वापस किया जाएगा और उसके बाद ब्याज तथा मुआवजे की राशि का निर्धारण होगा। शीर्ष अदालत ने इससे पहले कहा था कि नोएडा में बन रहे दोनों 40 मंजिला रिहाइशी इमारत बिना पर्याप्त नियमन के किया गया है और इन्हें गिरा दी जानी चाहिए। उल्लेखनीय है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 11 अप्रैल 2014 को दोनों इमारतों एपेक्स और सेयान को गिराने तथा निवेशकों का पैसा 14 प्रतिशत ब्याज के साथ तीन महीने के भीतर लौटाने का आदेश दिया था। उच्च न्यायालय के आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई थी। अभी इसी की सुनवाई चल रही है। 

 

 

Source: www.punjabkesari.in


जेपी इन्फ्राटेक: बिल्डर हुआ दिवालिया, क्या करे होम बायर्स । (13 Aug 2017)

नई दिल्ली
जेपी इन्फ्राटेक के होम बायर्स अभूतपूर्व हालात का सामना कर रहे हैं। पहली बार कोई हाउसिंग कंपनी दिवालियापन की दहलीज पर पहुंच चुकी है। होम बायर्स के लिए बड़ी ही विषम स्थिति है। अगर कोई स्टील कंपनी दिवालिया हो तो आमलोगों पर उसका असर बहुत ज्यादा नहीं होता लेकिन जब कोई रियल एस्टेट कंपनी जो अभी घरों का निर्माण कर ही रही हो, वह दिवालिया हो तो स्थितियां चुनौतीपूर्ण बन जाती हैं खासकर बायर्स के लिए। यही वजह है कि जेपी इन्फ्राटेक का मामला काफी गंभीर है क्योंकि इस मामले में अलग-अलग कानूनों और कुछ तो एक दूसरे के विरोधाभासी कानूनों की व्याख्या होगी जो भविष्य के ऐसे मामलों के लिए नजीर बनेगी।

जेपी इन्फ्राटेक को होम बायर्स को ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए? अब उनके पास आगे का क्या रास्ता है, आइए जानते हैं-

कंपनी लॉ ट्राइब्यूनल में अपना दावा ठोकें 
नैशनल कंपनी लॉ ट्राइब्यूनल (NCLT) ने दिवालियापन की प्रक्रिया को देखने के लिए गुरुवार को एक इन्साल्वंसी प्रफेशनल की नियुक्ति कर दी है। जेपी प्रॉजेक्ट्स के बायर्स 24 अगस्त तक क्लेम कर सकते हैं। इन्साल्वंसी प्रफेशनल एक या दो दिनों में निर्धारित फॉर्म में क्लेम मंगाएगा।

EMI चुकाना बंद करें

अगर आपने बैंक से लोन लिया है और आपको घर के पजेशन का इंतजार है तो आपको EMI चुकाना बंद नहीं करना चाहिए। विशेषज्ञों के मुताबिक इन्साल्वंसी प्रफेशनल कंपनी को पुनर्जीवित करने की कोशिश करेगा इसलिए बायर्स के लिए कुछ हद तक एक उम्मीद की किरण बाकी रहेगी। EMI चुकाना बंद कर देने से न सिर्फ बायर्स की क्रेडिट रेटिंग नेगेटिव होने का खतरा बढ़ेगा बल्कि दिवालियापन की प्रक्रिया के दौरान उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।

रिवाइवल प्लान क्या है?
इन्साल्वंसी प्रफेशनल को 270 दिनों के भीतर हाउसिंग स्कीम्स के लिए एक विश्वसनीय रिवाइवल प्लान बनाना होता है। इसके लिए उन्हें 90 अतिरिक्त दिनों का एक्सटेंशन भी मिल सकता है। रिवाइवल की समूची प्रक्रिया कोर्ट की देखरेख में होगी। रिवाइवल प्रक्रिया दूसरी कंपनियों की तरह सहज नहीं होने वाली। इसकी वजह है कि हजारों बायर्स ने कंपनी में निवेश किया है ऐसे में रिवाइवल इनके लिए काफी अहम है। अगर कंपनी की स्थिति नहीं सुधरती तो उसके कर्ज को चुकाने के लिए उसकी संपत्तियां बेची जाएंगी।

एक और विकल्प
अगर कंपनी रिवाइव नहीं होती है तो भी एक रास्ता है कि बैंक कंपनी के इक्विटी को खरीद लें। दिवालिया हुई कंपनी की संपत्तियों को बेचकर भी अच्छे पैसे नहीं जुटाए जा सकते क्योंकि संकटग्रस्त कंपनी की संपत्तियों के खरीदार औने-पौने दाम ही देना चाहेंगे। हालांकि बाद में इन संपत्तियों की अच्छी कीमत मिल सकती है। इसलिए बैंक कंपनी की संपत्तियों को बेचकर तत्काल अपना पैसा निकालने के बजाय कंपनी का इक्विटी खरीद सकते हैं। इस मामले में, बायर्स को अच्छी डील मिल सकती है क्योंकि बैंक भी प्रॉजेक्ट्स को रिवाइव करने की कोशिश करेंगे।

लिक्विडेशन की सूरत में आपके क्या हैं अधिकार?
अगर कंपनी रिवाइव नहीं होती तो उसे लिक्विडेट किया जाएगा यानी उसकी संपत्तियों को बेचकर कर्जदाताओं के पैसे चुकाए जाएंगे। हाउसिंग कंपनी के मामले में स्थिति जटिल हो जाती है क्योंकि दूसरी कंपनियों में तो कर्जदाताओं को आसानी से क्लासिफाइड किया जा सकता है। लेकिन मौजूदा मामले में बायर्स ही कंपनी के वास्तविक कर्जदाता हैं लेकिन उन्हें एक सिक्यॉर्ड क्रेडिटर्स की तरह अधिकार प्राप्त नहीं होगा। होम बायर्स को बैंकों के बराबर तवज्जो नहीं दी जाएगी क्योंकि बैंक ही मुख्य कर्जदाता हैं। परिसंपत्तियों को बेचकर जो पैसे जुटेंगे उन्हें सबसे पहले बैंकों के बीच बांटा जाएगा और आखिर में अगर पैसे बचे तो होम बायर्स को दिया जाएगा। 

देखें और इंतजार करें
चूंकि हजारों होम बायर्स का सीधे-सीधे हित जुड़ा है, इसलिए कोर्ट उनके प्रति सहानुभूति रख सकता है। यह अपनी तरह का पहला मामला है और इससे जुड़े बहुत सारे कानून हैं। इन कानूनों में कुछ तो एक दूसरे के विरोधाभासी हैं जिनकी कोर्ट द्वारा व्याख्या की जरूरत है। कोर्ट इस मामले में होम बायर्स के हितों को ध्यान में रखकर कोई फैसला कर सकता है। ऐसे में बायर्स के लिए सबसे अच्छी नीति 'वेट ऐंड वॉच' की है, साथ में उन्हें कानूनी मदद भी लेनी चाहिए।

Source: www.navbharattimes.indiatimes.com


DDA आवास योजना: नए परिवर्तनों के साथ अंतिम तिथि बढ़ी। (11 Aug 2017)

नई दिल्ली
डीडीए हाउसिंग स्कीम को मिल रहे ठंडे रिस्पॉन्स के बाद बुधवार देर रात डीडीए ने इस स्कीम में अप्लाई करने की अंतिम तिथि 11 सितंबर तक बढ़ा दी है। अभी तक यह तिथि 11 अगस्त थी। वहीं सरेंडर चार्ज में भी डीडीए ने भारी कटौती की है। संभावना जताई जा रही है कि अब बैंक रजिस्ट्रेशन की रकम के फाइनैंस के लिए आगे आएंगे और स्कीम के तहत लोगों को अप्लाई करने में कोई परेशानी नहीं आएगी।

स्कीम को लेकर बुधवार सुबह से ही डीडीए में गहमागहमी रही। देर शाम तक एलजी अनिल बैजल के साथ डीडीए अधिकारियों की मीटिंग चलती रही। इस स्कीम के तहत 12,072 फ्लैट्स उतारे गए हैं। इनमें एचआईजी के 87, एमआईजी के 404, एलआईजी के 11197 और जनता फ्लैट्स 384 हैं। इन फ्लैट्स के लिए अब तक महज 8000 रजिस्ट्रेशन हुए हैं। इनमें भी अधिकांश एचआईजी और एमआईजी के लिए हैं।

डीडीए के अनुसार, अलॉटमेंट ड्रॉ होने के पंद्रह दिन बाद तक अब फ्लैट को सरेंडर करने पर कोई सरेंडर चार्ज नहीं लगेगा। पहले इसके तहत 25 पर्सेंट का सरेंडर चार्ज था। वहीं अलॉटमेंट ड्रा के 16वें से 30 दिन में सरेंडर करने पर महज 10 पर्सेंट का ही सरेंडर चार्ज लगेगा। इसके बाद सरेंडर करने पर पूर्व की तरह ही 50 पर्सेंट राशि जब्त होगी। वहीं 91 डे के बाद सरेंडर करने पर व्यक्ति की पूरी राशि जब्त हो जाएगी।

हैं। महज 30 पर्सेंट रजिस्ट्रेशन ही ऑफलाइन हुए हैं। स्कीम को रिस्पॉन्स दिलाने के लिए डीडीए ने इस बार कई प्रयास किए हैं। पहली बार डीडीए प्राइवेट बिल्डरों की तरह अपने फ्लैट्स लोगों को दिखा रही है। इसके लिए हर क्षेत्र के लिए नोडल अधिकारियों की नियुक्ति भी हुई है। 

वहीं फ्लैट्स की खूबियां भी लोगों को बताई जा रही हैं। यहां तक की डीडीए ने बैंकों के साथ ही इस बार कई बार बात की ताकि फाइनेंस के लिए वह आगे आएं। डीडीए के प्रिंसिपल कमिश्नर (लेंड एंड हाउसिंग) जेपी अग्रवाल ने बताया कि तिथि 11 सितंबर तक बढ़ा दी गई है। वहीं सरेंडर चार्ज में भी काफी कमी की गई है। उम्मीद है कि अब बैंकों को रजिस्ट्रेशन मनी के लिए फाइनेंस करने में कोई परेशानी नहीं आएगी।

 

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RERA में प्रोजैक्ट रजिस्ट्रेशन न करवाना पड़ेगा महंगा, बिल्डर्स हो जाएं सावधान । (09 Aug 2017)

नई दिल्लीः जो बिल्डर्स नए रियल एस्टेट रैगुलेशन एक्ट (रेरा) से बचने की कोशिश कर रहे थे, वे ऐसा नहीं कर पाएंगे। बैंकों ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आर.बी.आई.) के साथ सलाह करने के बाद यह फैसला किया है कि उन प्रोजैक्ट्स को लोन नहीं दिया जाएगा, जो रेरा के तहत रजिस्टर्ड नहीं हैं। बैंकों से लोन नहीं मिलने के डर से बिल्डरों को सभी प्रोजैक्ट्स का रजिस्ट्रेशन रेरा के तहत करवाना पड़ेगा।

एक अधिकारी के मुताबिक रेरा का मकसद ग्राहकों का पैसा लेकर रातोंरात फरार होने वाले बिल्डरों पर लगाम लगाना है, इसलिए हम उन प्रोजैक्ट्स को कर्ज नहीं देंगे, जो नए रियल एस्टेट कानून के तहत रजिस्टर्ड नहीं होंगे। उन्होंने बताया कि इन रैगुलेशंस के मुताबिक चलने में हमारा भी फायदा है। लोन देने में पहले सावधानी बरतना जरूरी है। बाद में पछताने से कोई फायदा नहीं होता।

70 पर्सैंट रकम रखनी होगी अलग बैंक खाते में 
नए रियल ऐस्टेट (रैगुलेशन एंड डिवैलपमैंट) एक्ट, 2016 (रेरा) में बिल्डर को किसी प्रोजैक्ट के लिए ग्राहकों से ली गई 70 पर्सैंट रकम अलग बैंक खाते में रखनी होगी। इससे उसके पास किसी अन्य कामकाज के लिए 30 पर्सैंट रकम होगी। पहले वह ग्राहकों से लिए गए पूरे पैसे का इस्तेमाल उस प्रोजैक्ट के अलावा किसी और काम में कर सकता था। रियल एस्टेट इंडस्ट्री की संस्था अपने सदस्यों से रेरा के तहत प्रोजैक्ट को रजिस्टर कराने की अपील कर रही है, लेकिन इस मामले में उसे बहुत सफलता नहीं मिली है। बिल्डरों की सबसे बड़ी संस्था कन्फैडरेशन ऑफ रियल एस्टेट डिवैलपर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के प्रैजीडैंट जे. शाह ने कहा कि हमने अपने सभी मैंबर डिवैलपर्स से अपने प्रोजैक्ट्स रेरा के तहत रजिस्टर कराने को कहा है। उन्होंने इसका वादा भी किया है। शाह ने कहा कि रेरा का मकसद यह है कि ग्राहकों को तकलीफ न सहनी पड़े। डिवैलपर्स रजिस्ट्रेशन के लिए अप्लाई कर रहे हैं। इसे तेजी से प्रोसैस करने के लिए अथॉरिटी के लैवल पर इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार लाया जाना चाहिए। यह काम तेजी से होना चाहिए क्योंकि ग्राहक पोजैशन का इंतजार कर रहे हैं। वहीं, रजिस्ट्रेशन होने तक हम मार्कीटिंग या फाइनांसिंग की दिशा में काम नहीं कर सकते।

रियल एस्टेट सैक्टर को कर्ज देने में बरत रहे सावधानी 
बैंकों ने कुछ रियल एस्टेट कम्पनियों को कर्ज देने के लिए प्रमोटरों से पर्सनल प्रापर्टीज की गारंटी मांगी है। एक सरकारी बैंक के अधिकारी ने बताया कि हम बहुत आशंकित हैं। अगर हम कानून के मुताबिक कर्ज देते हैं तो जिस तरह से इसे बनाया गया है, उससे हमारे हितों की रक्षा नहीं होगी। अगर ऐसी प्रापर्टी में बैड लोन की सूरत बनती है तो ग्राहकों का पैसा लौटाने का प्रावधान है। हमारे बारे में ऐसे प्रोविजन नहीं किए गए हैं। इसलिए हम रीयल एस्टेट सैक्टर को कर्ज देने में बहुत सावधानी बरत रहे हैं।

 

Source: www.punjabkesari.in


Banks not to extend loans for projects not registered under RERA. (08 Aug 2017)

MUMBAI: Builders who have been thinking of ways to beat the new Real Estate Regulation Act are fast running out of time as banks, in consultation with the Reserve Bank of India, have decided not to extend loans to those projects which have not been registered under RERA.


"We have to look for some security mechanism, and since RERA is designed to weed out fly-by-night operators, we have decided not to extend credit to projects not registered with it," said a bank official who did not wish to be identified. "Adhering to the regulations will safeguard our interests, it's better to be safe now than regret later."

Banks have also sought additional collateral, including on personal properties of promoters, as guarantees while disbursing loans to a few real estate developers.

"We are very apprehensive because even if we disburse loans as prescribed under the law, the way it is designed, it does not protect our credit. If a loan turns bad, customers will be refunded but there’s no inherent protection for us under the law," said a PSU bank official. "So, we are being extremely careful about lending to the sector."

Under the new law, Real Estate (Regulation and Development) Act, 2016 (RERA), a developer will have to maintain 70% money collected from homebuyers in a separate account, which would leave them with only 30% of the sales proceeds to use for any other purpose, against 100% earlier.

"We have already directed all our member developers to register their projects under RERA and they have committed to do so," said Jaxay Shah, president of realty developers' apex body The Confederation of Real Estate Developers’ Association of India, or CREDAI.

"The spirit of RERA is to ensure that homebuyers shouldn't suffer. While developers are applying for registration, the infrastructure at the authority's level needs to be beefed up to ensure speedy processing of the same. Speed is crucial here because homebuyers are waiting for possession and we cannot further our marketing or financing efforts until we get registered," Shah explained.
 

The government enacted RERA and all the sections of the Act have come into force with effect from May 1 this year, and the builders had three months to register their new and ongoing projects with their respective state RERAs.
 

According to RERA, which aims to improve transparency in real estate sector and protect homebuyers' interest, builders are expected to disclose project-related information, including project plan, layout and government approvals-related information to prospective customers.

Any major changes in the project can only be done after receiving the consent of two-thirds of homebuyers in that project. To avoid diversion of funds, RERA mandates that developers should maintain 70% of the funds collected from buyers in a separate bank account in case of new projects.

Maharashtra, apart from Punjab and Madhya Pradesh, was one of the first states to notify its rules under the Act and establish MahaRERA. Until the midnight of July 31 deadline, the regulator had received total 10,852 applications for registration of ongoing projects across Maharashtra, which has now crossed 12,000.

 

Source: economictimes.indiatimes.com


RERA Deadline ends- no unregistered project can advertise or sell flats anymore. (02 Aug 2017)

From now, no unregistered project can advertise or sell flats

Less than 800 real estate projects were registered with the Real Estate Regulatory Authority (RERA) on Monday, the deadline for builders to do so. This against an estimate of over 4,000 projects to be registered with RERA in the state, implying a compliance rate of a mere 20%.

As per law, the projects that have missed the deadline are liable to a penalty amounting to ₹10,000 every day till they register with RERA. However, Kapil Mohan, Principal Secretary, Housing Department, said that the focus was on getting all projects registered, rather than penalising them. “We will conduct outreach projects at the district level to get realty projects registered with us,” he said.

However, starting Tuesday, no unregistered project can advertise in any media or carry out sale of any flats till the project is registered with RERA.

Mr. Mohan said that while they were ready to consider a delayed registration, violation of advertising and sale rules prior to registration will be acted upon strictly. “We will issue notices starting August 1 for unregistered projects advertising or selling flats,” he warned.

The realty sector, however, is still making a strong case for an extension of deadline for registration.

Suresh Hari, secretary, CREDAI-Bengaluru Chapter, said that there have been several issues with the RERA website including a limited 5 MB data allotted for uploading all relevant project documents which he said was clearly insufficient.

“Goa has extended the deadline by another three months, which indicate that the State government’s argument that the deadline was part of the RERA Act, 2016 and hence could not be changed by the State, was wrong,” he said.

Loopholes still remain

As part of registering their projects with RERA the project promoters need to submit a copy of their draft sale agreements and sale deeds. RERA prescribes a common format for the agreement and deed, which is yet to be notified by the housing department.

“Draft sale deed and agreement was part of the draft rules notified in October 2016. However, the final notification of these formats is yet to happen. This has given the builders an opportunity to continue with their unilateral agreement, hurting the interests of home buyers,” said M.S. Shankar, for Fight for RERA – Karnataka Chapter.



Source: www.thehindu.com


अब RERA की मंजूरी के बिना कोई प्रॉजेक्ट नहीं । (01 Aug 2017)

नई दिल्ली: बिल्डरों की मनमानी से निजात दिलाने के लिए बनाए गए रियल एस्टेट रेग्युलेटरी कानून के तहत मंगलवार से बिना रेग्युलेटर की मंजूरी कोई नया रियल एस्टेट प्रॉजेक्ट लॉन्च नहीं किया जा सकेगा। हालांकि तीन के अलावा अब तक किसी भी राज्य में रेग्युलेटर नियुक्त नहीं हुए हैं। हालत यह है कि दिल्ली में भी अब तक रेग्युलेटर नियुक्त नहीं किया गया है, लेकिन डीडीए के उपाध्यक्ष फिलहाल अंतरिम रेग्युलेटर के तौर पर काम कर रहे हैं। 

उल्लेखनीय है कि पिछले साल संसद ने रियल एस्टेट कानून पारित किया था। उसके बाद इस कानून को कई चरणों में लागू होना था। इसके तहत राज्यों को इस कानून से जुड़े रियल एस्टेट रूल्स नोटिफाई करने थे और रेग्युलेटर नियुक्त करने थे, लेकिन अब तक पंजाब, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र को छोड़कर किसी भी राज्य ने अब तक स्थायी रेग्युलेटर नियुक्त नहीं किए हैं।

महत्वपूर्ण है कि इस कानून के पूरी तरह से लागू होने का अर्थ यह है कि पहले से चल रहे प्रॉजेक्ट भी इस कानून के दायरे में आएंगे। ऐसे में यह जरूरी हे कि इन चल रहे प्रॉजेक्टस को भी रेग्युलेटर के सामने रजिस्टर कराना होगा, लेकिन कुछ राज्यों में तो अब तक रेग्युलेटर बने ही नहीं हैं। ऐसे में वहां यह कानून किस तरह से लागू होगा, इसे लेकर अभी केंद्र सरकार भी चुप है।

केंद्र सरकार के अफसरों का कहना है कि संसद ने कानून पारित कर दिया है और केंद्र सरकार जो सहायता दे सकती है, वह दे रही है। पूर्व आवास और शहरी विकास मंत्री एम.वैंकेया नायडू बीते कुछ महीने से लगातार राज्यों को पत्र लिखकर चेता रहे थे कि वे इस दिशा में फौरन कदम उठाएं और रेग्युलेटर नियुक्त करें ताकि खरीददारों को बिल्डरों की मनमानी से राहत मिल सके ।

Source: navbharattimes.indiatimes.com


डीडीए आवास योजना 2017:बढ़ सकती है आवेदन की अंतिम तारीख । (31 Jul 2017)

नई दिल्ली: डीडीए हाउसिंग स्कीम के लिए कम रिस्पॉन्स की वजह से अब डीडीए भी ड्रॉ की तिथि को लेकर चिंता में है। फिलहाल अधिकारी इस पर खुलकर कुछ भी कहने को तैयार नहीं हैं। अधिकारियों के अनुसार आखिरी हफ्ता इस स्कीम का रिस्पॉन्स तय करेगा। डीडीए हाउसिंग के प्रिंसिपल कमिनश्नर जेपी अग्रवाल ने कहा, 'अंतिम हफ्ते पर सब निर्भर है। स्कीम के अंतिम दिन यानी 11 अगस्त को हम समीक्षा करेंगे और उसके बाद ही किसी फैसले पर पहुंचेंगे।'

LIG फ्लैट्स में नहीं दिख रही दिलचस्पी
यह स्कीम 30 जून को लॉन्च हुई थी। अब तक 5,000 रजिस्ट्रेशन ही हुए हैं। बताया जा रहा है कि एचआईजी और एमआईजी के लिए काफी रजिस्ट्रेशन हो चुके हैं। दिक्कत सिर्फ एलआईजी फ्लैट्स में हैं। इस स्कीम में 12,072 फ्लैट्स उतारे गए हैं। इनमें से ज्यादातर पुराने ही हैं। इनमें एचआईजी के 87, एमआईजी के 404, एलआईजी के 11,197 और जनता फ्लैट्स 384 शामिल हैं। डीडीए के अनुसार एचआईजी और एमआईजी के लिए 500 से अधिक आवेदन मिल चुके हैं। इन दोनों को मिलाकर 491 फ्लैट्स उतारे हैं। बाकी आवेदन एलआईजी और जनता के लिए हैं। इनकी संख्या फ्लैट्स के मुकाबले काफी है।

आगे बढ़ सकती है ड्रॉ की तारीख

                                                                                                                                                                                                                                                                                        डीडीए के अनुसार, अगर अंतिम दिन फ्लैट्स से कम आवेदन होते हैं तो डीडीए ड्रॉ को करीब 15 दिन आगे बढ़ा सकती है। इसमें भी यह देखना होगा कि पूरी स्कीम की तिथि बढ़ाई जाए या फिर सिर्फ एलआईजी और जनता फ्लैट्स के लिए। स्कीम की तारीख आगे बढ़ती है तो उन लोगों में नाराजगी बढ़ सकती है जो अपना रजिस्ट्रेशन करवा चुके हैं। वे रजिस्ट्रेशन के लिए 1 लाख और 2 लाख रुपये जमा करा चुके हैं। ऐसे में पूरी स्कीम को आगे बढ़ा देना भी डीडीए के लिए काफी मुश्किल का काम होगा।

DDA: प्राइवेट बिल्डरों से आगे हैं फ्लैट्स 
वहीं कम रिस्पॉन्स की वजह डीडीए बैंकों के रजिस्ट्रेशन मनी के लिए आगे न आने के साथ नोटबंदी, रियल इस्टेट मार्केट में मंदी, आदि को मान रहे हैं। डीडीए के अनुसार हमारे फ्लैट्स मजबूती में प्राइवेट बिल्डरों से काफी आगे हैं। हमारे फ्लैट्स भूकंप रोधी हैं। बाजार से सस्ती कीमतों में उपलब्ध हैं। फ्लैट्स में लीकेज की कोई समस्या नहीं है। इनमें ग्रीन तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। पार्क, आदि की सुविधा है और शहर से दूर होने की वजह से यहां प्रदूषण भी काफी कम है।

 

Source: navbharattimes.indiatimes.com


रीरा वेबसाइट- राहत या समस्या । (29 Jul 2017)

रेरा की वेबसाइट लॉन्च होने के साथ ही लोगों में कन्फ्यूजन बढ़ गया है। केंद्र सरकार के एक अधिकारी का कहना है कि यूपी में रेरा बिना किसी संशोधन के लागू किया गया है। जबकि कुछ एक्सपर्ट का कहा है कि सरकारी स्तर पर कंप्लीशन सर्टिफिकेट (सीसी) और ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (ओसी) के मामूली फर्क के आधार पर बिल्डर लॉबी ने कुछ राजनेताओं के साथ मिलकर अखिलेश सरकार में हुए बदलाव को ही लागू करा दिया है। इसकी वजह से नोएडा और ग्रेटर नोएडा के कई बड़े प्रॉजेक्टों को आसानी से रेरा के दायरे से बाहर कर दिया गया है। इसे लेकर जनता अब सरकार से तस्वीर साफ कराना चाहती है। क्रेडाई ने स्पष्ट किया है कि ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट के आधार पर प्रॉजेक्टों को रेरा से सशर्त छूट मिलेगी। हालांकि, महाराष्ट्र में कंप्लीशन सर्टिफिकेट के आधार पर ही रेरा का दायरा तय किया गया है।

बाहर होंगे कई प्रॉजेक्ट
आवास एवं शहरी विकास मंत्रालय के संयुक्त सचिव और रेरा ड्राफ्ट कमिटी के सदस्य राजीव रंजन मिश्रा ने बताया कि मीडिया में यह बात जरूर आई है कि पहले रेरा में यह प्रावधान था कि जिन प्रॉजेक्टों को कंप्लीशन सर्टिफिकेट नहीं मिला है, उन्हें रेरा के दायरे में शामिल किया जाएगा। इसकी बजाय राज्य सरकार ने इसे कंप्लीशन की बजाय ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट के आधार पर रेरा का ड्राफ्ट में बदलाव कर दिया। इससे कई प्रॉजेक्ट रेरा के दायरे से बाहर हो गए हैं।

ओसी और सीसी में फर्क

जिन प्रॉजेक्टों में बिजली, लिफ्ट या पानी की सप्लाई है उन्हें टावर वाइज ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट दिया जा चुका है। उसी आधार पर उन्हें रेरा के दायरे से बाहर किया जा सकता है। वहीं, किसी प्रॉजेक्ट में क्लब या पार्क के साथ वे सभी सुविधाएं जिनका वादा बिल्डर ने प्रॉजेक्ट को लॉन्च करते समय किया था यदि वे अधूरी हैं तो उन्हें कंप्लीशन सर्टिफिकेट नहीं दिया जा सकता।

डेट को लेकर कन्फ्यूजन
रेरा एक मई, 2016 से लागू हो चुका है, जबकि यूपी सरकार ने एक मई 2017 को नोटिफिकेशन जारी किया है। शासन ने यह स्पष्ट किया है कि जिस डेट में नोटिफिकेशन हुआ है इसके बाद ही रेरा के प्रावधान लागू होंगे। मतलब साफ है कि जिन प्रॉजेक्टों के लिए 1 मई, 2017 में कंप्लीशन अप्लाई किया गया है वे सभी रेरा के दायरे से बाहर हो जाएंगे।

 

Source: navbharattimes.indiatimes.com


Jail term for home buyer if they fail to obey the orders of RERA. (26 Jul 2017)

As the Real Estate Regulation and Development Act, 2016, crossed the Rubicon on May 1, it is going to change the way India invests into the real estate sector. Being a consumer-centric law, it is undoubtedly a delightful scenario for buyers. But there is one more dimension to it - jail term for a home buyer for up to a year if he fails to obey the orders of the regulatory authorities or the appellate tribunal.

Section 68 of the Act says: “If any allottee, who fails to comply with, or contravenes any of the orders or directions of the Appellate Tribunal, as the case may be, he shall be punishable with imprisonment for a term which may extend up to one year or with fine for every day during which such default continues, which may cumulatively extend up to ten per cent of the plot, apartment or building cost, as the case may be, or with both.”

Now, sample this:
Twenty-eight-year-old Sumit Sehrawat, a resident of Old Gurgaon, bought a flat in Dharuhera. When his gang of four friends came to know about it, they too applied for flats in the same project. Owing to fund crunch, they decided to give up their flats. They approached the developer and sought their money back. Upon refusal, they manhandled the small-time developer and the staff and threatened to lodge a false complaint.

Cases such as these are faced by developers, especially small builders, who have been held to ransom by certain crafty buyers.

Trashing the provision in the Act, Abhay Upadhyay, who is spearheading the campaign Fight for RERA, says: “The clause was not required at all. No country in the world makes rules for specific instances. There may hardly be any cases where a builder has filed a case against a consumer. Since the Act had to be balanced, the clause has been incorporated. In my opinion, it will not be invoked in the next 100 years.”

But developers highlight that any Act having no control over the buyers would have been meaningless. Even buyers need to be disciplined.

“The initial reaction post-RERA is ‘advantage-buyer’ to the extent that we may see it becoming ‘disadvantage real estate developer’. Let the law be balanced and fair to both the sides,” maintains Niranjan Hiranandani, Hiranandani Group Chairman.

Manoj Chaudhary, MD, Airwil Infra Ltd, says, “We have had multiple instances where buyers have harassed developers on illicit grounds to make way for their petty profits.” Adding to this, Prithvi Raj Kasana, MD, Morpheus Group, says, “Buyers forcing developers to alter project details other than the one approved just because a majority of them want the change should also be considered by the tribunal.” He maintains that developing projects over a span of three – four years requires a lot of financial planning and in case there are stuck payments from the buyer’s end all these planning may go for a toss. But Fight for RERA’s Upadhyay highlights that 90% of home buyers avail of home loans to buy a house. “So the question of them faulting on paying money to the builder does not arise. They may fault on the timely payment of their EMI which is already covered under the relevant provisions of the existing laws.

“It makes sense that developers should be protected from buyers who renege on a contract, just as buyers are protected from any untoward action or lack of action from developers,” says JLL India CEO & Country Head Ramesh Nair. The company’s chairman, Anuj Puri, adds that the Act was not put together and rolled out as a one-sided punitive tool for developers alone. “In the past, developers have also had their issues with buyers, and any fair and just legislation must take a balanced view. This is why RERA will also hold buyers accountable,” maintains Puri.

However, other experts point out that such a provision will hardly be used against a buyer.

Sudip Mullick, partner, Khaitan and Co, says: “The only scope I see is if the buyer does not take possession or stops paying maintenance. If he does not take possession then that would lead to the termination of the contract or his money would be forfeited.” He further adds that there may be cases where a troublemaker buyer may want to burden the court with frivolous litigations but “getting a jail term for any of the above acts is a far-fetched situation. I don’t see any other reason why a buyer would breach the contract and end up in jail.”

“If someone is a genuine buyer, such an issue would never crop up,” says Pune-based property consultant Rani Wilfred.

Notwithstanding the fact that it’s for the courts to award punishments to the erring parties, developers have been lamenting that they might be axed for the delay on the part of government agencies. What about accountability of the government departments? The Act fails to talk about the liability of the babus.

“Government departments are not covered specifically and delays caused due to red-tape and long-drawn local procedures should not be attributed to the developers and result in unjustified action against them,” says Puri.
“It is doubtful whether the authority can direct government agencies or bureaucrats to carry out a task. There may be provisions which may be helpful to authorities to appropriately take steps or even on an application recommend the government agency to expedite. It may not be binding on the department concerned but they can be asked to do so” explains Mullick.He further adds that the government bodies are also involved in residential and commercial real estate business and will come under the purview of RERA. “So, it is not that only developers will suffer, the government will also suffer,” sums up Mullick.

 

Source: economictimes.indiatimes.com


बायर्स को जल्द फ्लैट दे रियल एस्टेट बिल्डर्स - मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ । (25 Jul 2017)

लखनऊ: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रियल एस्टेट बिल्डर्स को चेतावनी दे दी है कि यदि 1.5 लाख बायर्स को जल्द फ्लैट नहीं देते तो उनके खिलाफ ऐक्शन लिया जाएगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस समय रियल एस्टेट कारोबारियों के सामने विश्वास पर खरा उतरने की बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा 'राज्य सरकार का चार माह का अनुभव है कि प्रदेश में बिल्डरों और खरीदारों के बीच में बड़ी समस्या है।'

मुख्यमंत्री ने यहां कनफेडरेशन ऑफ रियल एस्टेट डिवेलपर्स असोसिएशन्स ऑफ इंडिया (क्रेडाई) द्वारा आयोजित सम्मेलन में कहा, 'रियल एस्टेट क्षेत्र द्वारा योजनाओं को आधा-अधूरा छोड़ देना सबसे बड़ा संकट है। नोएडा और ग्रेटर नोएडा में यही समस्या सामने आ रही है। लगभग डेढ़ लाख खरीदारों को धनराशि अदा करने के बाद भी घर नहीं मिल पा रहा है। इससे विश्वसनीयता का संकट पैदा हो गया है। प्रदेश सरकार के प्रयास पर कुछ बिल्डरों ने सकारात्मक रुख अपनाया और आवास देने की समयसीमा तय कर दी, जबकि कुछ बिल्डर कोई कदम नहीं उठा रहे हैं। संवाद से रास्ता न निकलने पर प्रदेश सरकार को सख्त कदम उठाना पड़ेगा। सरकार की अपील है कि कार्रवाई की स्थिति न उत्पन्न हो।'


मुख्यमंत्री ने कहा कि दूसरी बड़ी समस्या अनधिकृत कॉलोनियों के निर्माण की है। डिवेलपर्स द्वारा बिजली, पानी, सड़क, सीवर, ड्रेनेज आदि सुविधाओं का विकास किए बगैर कॉलोनियां बना दी जाती हैं। बाद में इन कॉलोनियों का नगर निगम या विकास प्राधिकरण आदि संस्थाओं द्वारा अधिग्रहण कर इनके विकास के लिए अभियान चलाया जाता है। उन्होंने कहा कि शहरी क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं के लिए आने वाला व्यक्ति बीमारी का शिकार हो जाता है और दोष सरकार पर आता है कि वह कुछ नहीं कर रही है, जबकि इन अनधिकृत कॉलोनियों के विकास के लिए बड़े पैमाने पर पूंजी की आवश्यकता होती है। ऐसी स्थिति को रोके जाने की आवश्यकता है।

योगी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वर्ष 2022 तक सभी को आवास मुहैया कराने के लक्ष्य को ध्यान में रखकर प्रदेश सरकार अधिक से अधिक मकानों का निर्माण कराना चाहती है। प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के अंतर्गत 10 लाख आवास निर्माण का लक्ष्य है, जिसमें से 6 लाख परिवारों को चिन्हित कर धनराशि का आवंटन भी कर दिया गया है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के लिए राज्य सरकार ने दो लाख आवासों के निर्माण का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस योजना के तहत केंद्र सरकार द्वारा डेढ़ लाख रुपये और राज्य सरकार द्वारा एक लाख रुपये, कुल ढाई लाख रुपए की धनराशि दी जाती है। योगी ने कहा कि राज्य सरकार ने प्रदेश में केंद्र सरकार के 'रेरा ' कानून को लागू कर दिया गया है। राज्य सरकार के इस फैसले में रियल एस्टेट क्षेत्र के सहयोग और समर्थन के लिए प्रसन्नता जताते हुए उन्होंने कहा कि इस कानून में ऑनलाइन पंजीकरण की व्यवस्था की गई है। आगामी 26 जुलाई को इसका पोर्टल भी शुरू कर दिया जाएगा।

 

Source: navbharattimes.indiatimes.com


Government extended deadline for businesses to register under GST. (24 Jul 2017)

The Indian government has extended the deadline till August 16 for businesses to opt for composition scheme under the GST regime.

"With a view to ease the compliance burden of provisionally migrated small taxpayers opting to pay tax under the composition scheme, it has been decided to extend the time limit for filing intimation for composition levy up to August 16, 2017," the finance ministry said in a statement.

Small businesses with turnover of up to Rs 75 lakh were earlier given time till July 21 to opt for the scheme in the Goods and Services Tax regime.

The government is mindful of the concerns of tax payers, especially the small taxpayers, arising from transition to the GST regime from July 1, 2017, the ministry said.

To opt for composition scheme, the taxpayer needs to log into his account at the GST Portal www.gst.gov.in and select 'Application to opt for the Composition Scheme' under 'Services' menu. They have to fill up the Form GST CMP-01 to opt for the scheme.

Under composition scheme, traders, manufacturers and restaurants can pay tax at 1 per cent, 2 per cent and 5 per cent, respectively.

The ministry further said taxpayers willing to cancel their GST registration can do so till September 30,2017.

"Taxpayers who were provisionally migrated by virtue of being registered under the existing laws, but who are no longer required to be registered under GST, the period of applying for Cancellation of Registration is being extended up to September 30, 2017," it said.

There are over 70 lakh excise, VAT and service taxpayers who have migrated to the GSTN portal for filing returns in the GST regime which kicked in from July 1.

Besides, there are over 8 lakh new taxpayers who have registered on the portal. These new registered taxpayers can opt for the composition scheme at the time of registration.

 

Source: www.news18.com


GST on Real Estate (18 Jul 2017)

The idea of GST stands out on account of its usage of ‘tax credits’. the first purpose of this can be to scale back and eliminate instances of cascading taxes or ‘tax-on-tax’ paid at totally different stages of the real estate supply chain.

GST is expected to keep realty prices low for the affordable housing section, however increase prices for others. Considering that nearly seventy per cent of the important estate market caters to the middle to high financial gain phase, GST may shift focus, significantly of smaller developers towards the high volume, low to medium financial gain phase.

While it is early days yet to state the exact impact of GST on the real estate market, the above issue of being able to incorporate tax credits carries the potential to reduce costs.

There are other aspects that also need consideration such as:

The incorporation of a tax credit system will require all parties within the value chain to be under the GST net. Several sources of material such as river sand etc. are not from organised sources.

The composition scheme could be retained as an option, but only to providers of materials; it will need being withdrawn from developers.

A separate regime has been contemplated for collection of GST. The tax audit and quality control protocols will also need considerable changes to ensure that advantages of low levies in certain segments and materials are not misused in an inappropriate segment, such as a developer claiming higher credit for a material not used in construction, but which is difficult to detect once the unit has been constructed.

Stamp duty remains as a single issue of contention for both buyers and sellers in the real estate market. It had been presumed that the GST regime would have subsumed or lessened the burden of this tax to an extent – except that this did not happen. The one hope that GST could offer is to provide an opportunity to the developer to reduce property prices, which in turn would also reduce the incidence of stamp duty as a percentage of the property price.

One of the positive effects of GST that is being anticipated is its impact on certain segments of real estate such as warehouses and logistics facilities that facilitate road or rail based movement of goods between States.

Earlier, routes and positions of warehousing facilities would be determined by the tax incident on the goods being transported to the warehouse; so a facility located in a low tax incidence area would be more viable as compared to a high tax incidence area, moderated by the cost of transport along both routes.

GST by itself cannot be treated as a panacea to real estate market woes – both for the buyer as well as for the seller or developer. Broader policies in land and housing/ commercial stock management, ensuring availability of appropriate financing resources etc. will be just as important to leverage the opportunity posed by GST.


Developers can get RERA-READY if they comply with these points. (13 Jul 2017)

The Real Estate (Regulation and Development) Act, 2016 (RERA), has given India’s realty sector a new direction however there are some growing issues being faced by developers. Every new thing whether it’s a law take time to set on the base. Developers must comply to few things for friendly acceptance of the RERA ACT.
 

Redesigning business
Madhya Pradesh RERA regulator, Antony De Sa, says even those states which are ready, developers are not ready. “For a large number of developers it meant filling forms, which are lengthy and cumbersome. Developers will have to redesign their allotment letters, sales deeds, brochures, advertisements and their cash-flow management to become RERA-ready.” Haryana RERA Executive director, Dilbag Singh Sihag, says that even though the state has not officially notified rules, developers are being registered after submitting an affidavit. “In Haryana, more than 15 applications have been received, out of which 8 registrations have been issued while others are in the pipeline and will be issued shortly.”

Understanding the process
KPMG National Head of real estate and construction, Neeraj Bansal, said that developers were not aware of what has to be done. “Many in the industry are thinking that there are certain forms which have to be filled and a law firm has to be hired to do it for them. There is much more to it before the form comes into the picture. Both for the government machinery and developers, the mammoth task is to understand the system,” explained Bansal. He added that an Act and rules have to systematically be applied which is a significant effort and for which continuous guidance is needed.

Tutorials from Naredco
In order to guide developers on how to go about the new law, Naredco chairman and DLF head, Rajeev Talwar, said that Naredco had been organising paid-for services to guide developers on how to be RERA-ready. “We need to change the mind-set for RERA to kick in,” he added.

Diligence to curb structural defects
Haryana’s Sihag further added that his was the only state that had a system in place wherein a developer used to give an undertaking to manage a project for a period of 5 years. “Structural defect has been defined explicitly in the state Act, thus, ruling out any confusion on what a structural defect is, at least in Haryana”. However, De Sa added, “Any builder worth his salt would not construct a poor building.”

KPMG’s Bansal said developers will have to work around this and create a process in a transparent manner. “Unlike in the past, they will now have to create a back-to-back warranty with suppliers in case a challenge comes up. Starting from the point of contracting to execution and finally handing over, documentation has to be clearly spelled out. Workmanship is a loose term – is it tiles, paints, electrical wiring or something else? A developer will have to clearly spell out his liabilities in a transparent manner.”

Khaitan and Co Partner, Sudip Mullick, added that for structural defect for up to 5 years, a builder can appropriately cover himself through insurance. “The concern for the builders would be workmanship or quality of services because workmanship is a vague term and the applicability of workmanship for 5 years may pose a considerable challenge to the builder.”

Make registration number a marketing tool
De Sa went a step ahead to say that consumers should demand RERA registration number from developers before booking a unit. “In fact, developers could use this number as a marketing tool to push their projects and forums such as Magicbricks, can play a crucial role in creating awareness and advertise only such projects”. Talwar added that there should be drives by RERA authorities to educate all stakeholders.

 

 

Source: economictimes.indiatimes.com

 


अब किराए के लिए आपको जीएसटी(GST) पंजीकरण करना होगा। (12 Jul 2017)

नई दिल्लीः रिहायय़ी संपत्ति से आने वाले पैसों पर जी.एस.टी. से छूट दी गई है लेकिन वाणिज्यिक उद्देश्य से किराया या पट्टे से सालाना 20 लाख रुपए से अधिक आय पर जी.एस.टी. लगेगा। राजस्व सचिव हसमुख अधिया ने कहा कि अगर आवासीय संपत्ति दुकान या कार्यालय के लिए किराया पर दिया गया है, तो 20 लाख रुपए से कम किराए पर जी.एस.टी. नहीं लगेगा लेकिन अगर किराया 20 लाख से अधिक है तो जी.एस.टी. में जरूरी होगा।

अधिया ने जी.एस.टी. मास्टर क्लास में कहा, रिहायी मकान से मिलने वाली किराया आय को छूट दी गयी है लेकिन अगर आपने अपनी इकाई वाणिज्यक उपक्रम को दी है है तब अगर आप 20 लाख रुपए से अधिक प्राप्त कर रहे हैं तब आपको कर देना होगा। जो करदाता छूट सीमा से अधिक कमा रहे हैं, उन्हें जी.एस.टी. नेटवर्क से पंजीकरण करना होगा और कर देना होगा। जी.एस.टी.एन. के मुख्य कार्यपालक अधिकारी प्रका कुमार ने कहा कि 69.32 लाख पंजीकृत् उत्पाद, सेवा कर और वैट भुगतानकर्ता जी.एस.टी.एन. पोर्टल पर चले गए हैं। पुरानी अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था में ऐसी 80 लाख इकाइयां थी।

 

Source: www.punjabkesari.in


स्कीम हाउसिंग फॉर ऑल के तहत बिल्डरों को सस्ते मकान के लिए जमीन और पैसा देगी सरकार। (10 Jul 2017)

नई दिल्ली। मोदी सरकार अपनी महत्वाकांक्षी स्कीम हाउसिंग फॉर ऑल को सफल बनाने के लिए प्राइवेट डवलपर्स के साथ पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल पर सस्ते घरों के निर्माण करने की योजना बना रही है। सरकार ने इसके तहत सस्ते घर निर्माण का ड्राफ्ट मॉडल तैयार कर मिनिस्ट्री ऑफ हाउसिंग एंड अर्बन पॉवर्टी एलिवेशन (हूपा) के वेबसाइट पर अपलोड किया है और इससे जुड़े हितधारों से 30 जून तक राय मांगी है।

सरकार ने नए ड्राफ्ट रूल में प्राइवेट डवलपर्स के साथ मिलकर सस्ते घरों का निर्माण के लिए छह मॉडल बताए हैं। इसमें लैंड उपलब्ध कराने से लेकर फंडिंग तक का प्रावधान है। रियल एस्टेट एक्सपट्र्स का मानना है कि नए ड्राफ्ट में किए गए प्रावधान से देश भर में सस्ते घरों के निर्माण में तेजी आएगी जिससे 2022 तक हाउसिंग फॉर ऑल को पूरा करने में मदद मिलेगी।

उल्लेखनीय है कि अभी तक सरकर की तमाक कोशिशों और कई तरह की रियायतें देने के बावजूद प्राइवेट अफोर्डेबल हाउसिंग प्रोजेक्ट्स लॉन्च करने में प्राइवेट डवलपर्स उदासीन रवैया अपनाए हुए हैं।

क्या है प्राइवेट लैंड पर पीपीपी मॉडल ?

इस मॉडल के तहत प्राइवेट डेवलपर्स को अपनी जमीन पर सस्ते घर बनाने होंगे। इसके एवज में सरकार स्टेट सब्सिडी, स्टाम्प ड्यूटी पर छूट, डेवलपमेंट चार्ज पर छूट, एफएआर में इजाफा आदि देगी।

प्रोजेक्ट की होगी मॉनिटरिंग

सरकार ईडब्लयूएस हाउसिंग यूनिट बनाने के लिए 1.50 लाख रुपए प्रति यूनिट ग्रांट दी जाएगी, लेकिन प्रोजेक्ट के तहत बने घरों की कीमत सरकार तय करेगी और मॉनिटरिंग भी करेगी।

क्या है सरकारी जमीन पर पीपीपी मॉडल ?

इस मॉडल के तहत प्राइवेट डवलपर्स को सरकार जमीन देगी। उस जमीन पर डवलपर्स को सस्ते घर बनाने होंगे। इस मॉडल को छह कैटेगिरी में बांटा गया है।

3.14 करोड़ सस्ते घर चाहिए शहरों में 2022 तक

2.95 करोड़ घर चाहिए ग्रामीण एरिया में

ये हैं छह मॉडल

मॉडल 1 सरकारी भूमि पर सब्सिडाइज्ड हाउसिंग : इस मॉडल के तहत डवलपर्स को सरकार जमीन उपलब्ध कराएगी।

मॉडल 2 मिश्रित विकास क्रॉस-सब्सिडाइज्ड हाउसिंग :

इस मॉडल में सस्ते घर के साथ डेवलपर्स को महंगे घर का निर्माण व सेल की अनुमति होगी।

मॉडल 3 एन्युटी आधारित सब्सिडाइज्ड हाउसिंग : इस मॉडल में सरकार डवलपर को 20 साल तक एन्युटि देगी।

मॉडल 4 एन्यूटी कम कैपिटल ग्रांट सब्सिडाइज्ड हाउसिंग : इस मॉडल में सरकार डवलपर को कंसट्रक्शन के समय 50 फीसदी व शेष रकम अगले 15 से 20 साल में देगी।

मॉडल 5 डायरेक्ट रिलेशनशिप ऑनरशिप हाउसिंग : इस मॉडल में सरकारी जमीन पर सस्ते घरों का निर्माण कर बेचेगा।

मॉडल 6 : डायरेक्टर रिलेशनशिप रेंटल हाउसिंग : इस मॉडल के तहत डवलपर रेंटल हाउसिंग बनाएगा।

Source: www.patrika.com


यदि आप किराए पर अपना घर देने की योजना बना रहे हैं तो इस खबर को सावधानीपूर्वक पढ़ें। (06 Jul 2017)

नई दिल्लीः यदि आप किराए पर घर या लीज़ में सौदा देते हैं तो आपको इन बातों को ध्यान में रखना चाहिए जो कि आपको किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी से बचाने में मदद करेगा। किराए पर अपना फ्लैट देने वाले लोगों को हमेशा यह डर होता है कि किराएदार कहीं घर हड़प न ले। कई लोग अपना घर खाली रहने देते हैं लेकिन किसी को किराए पर नहीं देना चाहते हैं। वैसे तो किराएदार और मकान मालिक के बीच का झगड़ा कोई नई बात नहीं है। लेकिन घर के लिए रेंट एग्रीमेंट करने से पहले कुछ बातों का ध्यान देना किराएदार और मकान मालिक दोनों के लिए जरुरी है।

2 तरह के होते हैं एग्रीमेंट

मकान मालिक और किराएदार के बीच दो तरह के एग्रीमेंट होते हैं। पहला, लीव एंड लाइसेंस एग्रीमेंट और दूसरा रेंट एग्रीमेंट। लीव एंड लाइसेंस एग्रीमेंट में मकान मालिक को किराएदार की मर्जी के बगैर घर में दाखिल होने का पूरा अधिकार होता है। ऐसी हालत में किराएदार के पास कुछ भी कहने का हक नहीं है। वहीं, रेंट एग्रीमेंट में मकान मालिक अपने किराएदार को एक तय समय के लिए तय कीमत में घर का पूरा अधिकार देता है। यानी जितने दिनों के रेंट एग्रीमेंट है उस फ्लैट पर किराएदार का हक होगा।

मकान मालिक के पास भी चाबी

रेंट अग्रीमेंट के इलावा लीव ऐंड लाइसेंस एग्रीमेंट में प्रॉपर्टी के अहाते का अधिकार किराएदार के पक्ष में नहीं होता है। पजेशन दिखाने के लिए कॉन्ट्रैक्ट में अडिशनल लाइन जोड़ी जाती है कि मकान मालिक के पास भी घर की चाबियां रहेंगी ।

नोटिस पीरियड

मकान मालिक या किराएदार में जो भी लीज एग्रीमेंट को खत्म करना चाहता है, उसे दूसरे को नोटिस देना पड़ता है। नोटिस पीरियड खत्म होने के बाद ही लीज एग्रीमेंट भी खत्म हो सकता है जबकि लीव ऐंड लाइसेंस एग्रीमेंट में कोई नोटिस पीरियड की जरूरत नहीं होती है।

इन बातों का रखें ध्यान

लीव एंड लाइसेंस एग्रीमेंट में यह साफ-साफ लिखना जरूरी है कि एग्रीमेंट किसके-किसके बीच हो रहा है। इसकी जरूरत रेंट एग्रीमेंट में नहीं होती है। जब इस तरह का करार होता है तो उसमें किसी खास व्यक्ति का नाम लिखने के बजाय लाइसेंसर और लाइसेंसी लिख सकते हैं। इसमें करार किसी खास शख्स के बजाय मकान मालिक और किराएदार के बीच होगा। अगर किसी किराएदार का नाम लिख देंगे तो वह उस खास शख्स के लिए ही होगा।

Source: www.punjabkesari.in


DDA आवास योजना 2017 हुआ लॉन्च, आज से कर सकते हैं आवेदन । (01 Jul 2017)

डीडीए की हाउजिंग स्कीम-2017 शुक्रवार को लॉन्च हो गई है। इस बार स्कीम में 12,072 फ्लैट्स हैं। स्कीम में आवेदन करने वाले फॉर्म में एक और कॉलम आधार का जोड़ा गया है, लेकिन यह साफ किया गया है कि आधार जरूरी नहीं है। स्कीम के लिए सबसे अधिक 4,349 फ्लैट रोहिणी सेक्टर-34 और 35 में हैं। स्कीम में 87 फ्लैट एचआईजी के भी रखे गए हैं। इनमें 20-20 फ्लैट वसंतकुंज और द्वारका में हैं। फॉर्म को डीडीए की बेवसाइट से ऑनलाइन डाउनलोड और जमा किया जा सकता है।

फॉर्म की कीमत
डीडीए सूत्रों ने बताया कि इसके लिए पहले चरण में पांच लाख ब्रोशर छपवाए जा रहे हैं। इस बार फॉर्म में लगे ब्रोशर की कीमत 200 रुपये रखी गई है। पुरानी हाउजिंग स्कीम-2014 में इसकी कीमत 150 रुपये रखी गई थी। इसमें तमाम टैक्स शामिल कर लिए गए हैं। डीडीए को उम्मीद है कि इस बार उनकी स्कीम के लिए 10 लाख से अधिक आवेदन आएंगे। पिछली बार करीब 20 लाख आवेदन फॉर्म भरे गए थे। फ्लैट लेने की चाह रखने वालों के लिए इस बार ब्रोशर में ही फ्लैट का इंटरनल डिजाइन भी छापा गया है। उसमें बताया गया है कि आपके फ्लैट में कितनी जगह में किचन, बेडरूम या टॉइलट और ड्रॉइिंग रूम आदि है।

कहां कितने फ्लैट
12,072 फ्लैटों की इस स्कीम में 11,197 फ्लैट एलआईजी और सिंगल बेड रूम हैं। इनमें रोहिणी सेक्टर-34 और 35 के बाद सबसे अधिक तीन हजार 612 फ्लैट नरेला-जी-2 और जी-8 में और 2,059 फ्लैट सिरसपुर में हैं। इसके अलावा 404 एमआईजी हैं। इनमें 331 फ्लैट नरेला पॉकेट-ए9 में हैं। एचआईजी फ्लैटों की कुल संख्या 87 और 384 जनता फ्लैट हैं।

11 अगस्त तक कर सकेंगे आवेदन
स्कीम के लिए आवेदन करने की अंतिम तारीख 11 अगस्त है। इस दौरान बैंकों और डीडीए के चुनिंदा ऑफिसों से फॉर्म लिए जा सकेंगे। पहले स्कीम में 10 बैंक शामिल हो रहे थे, लेकिन अब दो बैंकों ने अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं। इसमें एक बैंक ने तर्क दिया है कि उसका सॉफ्टवेयर पुराना है तो एक बैंक ने एंप्लॉयीज कम होने की बात कही है।

सूत्रों ने बताया है कि आवेदन करते वक्त आवेदनकर्ता को कोई दस्तावेज जमा नहीं करने होंगे। बस उन्हें फॉर्म भरके जमा करना होगा। इसके बाद अगर उनका नाम ड्रॉ में निकल जाता है तो फिर फॉर्म में किए गए दावों के लिए दस्तावेज लिए जाएंगे। फॉर्म में जो भी नाम लिखा जाएगा वह पैन कार्ड वाला होना चाहिए।

कौन कर सकता है अप्लाई
- देश का कोई भी नागरिक जिसकी उम्र 18 साल या उससे अधिक है वह ऑनलाइन या ऑफलाइन तरह से आवेदन कर सकता है।
- आवेदनकर्ता का दिल्ली में कोई प्लॉट या फ्लैट न हो। साथ ही अविवाहित संतान के नाम भी कोई फ्लैट न हो।
- एक व्यक्ति एक ही ऐप्लिकेशन भर सकता है।
- पति और पत्नी दोनों लोग अप्लाइ कर सकते हैं लेकिन दोनों को फ्लैट मिलने की स्थिति में एक ही फ्लैट मिलेगा।

Source: navbharattimes.indiatimes.com


Green Signal to Jewer International Airport by government, Flights to be on runway by 2022. (28 Jun 2017)

New Delhi:   Government has made the decision in favor of Green Field Airport in Jewer located in Greater Noida and the flights will be on runway within next few years. With the arrival of Jewer international airport greater Noida will boom in with various factors and the burden on IGI Airport will be reduced.
Civil Aviation Minister Ashok Gajapathi Raju said at a press briefing that "in-principle clearance has been granted" for the airport.
"The Yamuna Expressway Industrial Development Authority has notified 3,000 hectares of land for a world-class international airport," Raju added.

"Noida International Airport will cater to 30-50 million passengers per year over the next 10-15 years," Raju tweeted. The airport will help reduce congestion at the Delhi international airport.

Of the total land, 1,000 hectares will be acquired under the first phase of airport development, which will cost Rs 2,000 crore.

The government expects the entire project to cost Rs 15,000 crore to Rs 20,000 crore. The metro service in Noida is also likely to be extended up to Jewar in order to improve connectivity to the airport.

The state government, which has been pushing for this project, has also been told by the Centre to improve road conditions and provide multi-modal transport facilities, said Secretary, Ministry of Civil Aviation, R N Choubey.

The announcement of a second airport in the national capital region comes at a time when the Indira Gandhi International Airport in New Delhi grapples with an ever-increasing number of passengers.

The IGI Airport currently handles nearly 62 million passengers every year. As per its updated master plan, the passenger handling capacity will be increased to 109.33 million passengers per year in a phased manner.
However, the airport is likely to reach that figure in the next seven years, necessitating a second airport in the vicinity of the national capital, according to the government.

"Within seven years Delhi airport will see 109 million trips a year, which will saturate its capacity. For the sake of NCR and NCR's connectivity having a second airport is vitally important and that is what Noida international airport will accomplish," Minister of State for Civil Aviation Jayant Sinha said.

Senior minister Raju said that the government will honour the Operation Management and Development Agreement (OMDA) with GMR, which operates the Delhi Airport jointly with the Airports Authority of India (AAI) for Delhi airport. As per this agreement GMR will have the first right of refusal in case an airport is built within 150 kilometres of the existing one.

The capacity to handle 30-50 million passengers per year will put the Jewar airport on par with the Mumbai airport, which sees 45 million passengers per year.

Sinha added that the new airport will also provide seamless domestic and international connectivity to western UP with Noida, Agra, Mathura, Meerut, Vrindavan, Meerut, Moradabad and Bulandshahr likely to serve as the catchment area for the new aerodrome.

"Noida International Airport will become like an aerotropolis with an airport at the centre and a whole host of economic activities around it," said Sinha.

The first phase will be a reality in five to six years, which includes procurement of land, bidding it out for construction and then providing connectivity, Civil Aviation Secretary Choubey said.

He added that the representatives of the Uttar Pradesh government have assured the Centre that farmers are willing to provide the land for airport development on negotiated settlement basis.

In Lucknow, Uttar Pradesh Civil Aviation Minister Nand Gopal Nandi and health minister Siddhartnath Singh told newspersons that the upcoming airport is expected to enable Noida to become a major global electronics manufacturing cluster, with significant investments in the sector already coming in from major global players like Samsung.

Tourism to destinations such as Mathura, Vrindavan and Agra will also see a major boost, they said, adding that it is also likely to serve as major logistics hub for various manufacturing and export centers in the western part of the state.

Source: www.news18.com
 


भारतीय स्टेट बैंक(SBI) द्वारा प्रॉपर्टी की ई-नीलामी की घोषणा । (22 Jun 2017)

नई दिल्ली: भारतीय स्‍टेट बैंक (एस.बी.आई.) ने मेगा ई-नीलामी के जरिए प्रॉपर्टी की बिक्री करने की घोषणा की है। यह ई-नीलामी 23 जून को आयोजित की जाएगी। देश के सबसे बड़े इस सरकारी बैंक ने इसकी जानकारी ट्विटर पर दी है। बैंक कुल 150 प्रॉपर्टी की नीलामी करेगा, जिसमें रेजिडेंशियल, कॉमर्शियल और कृषि भूमि शामिल है। एस.बी.आई. ने अपनी वैबसाइट पर कहा है कि इन प्रॉपर्टी को हाउसिंग और बिजनेस लोन के लिए बैंक के पास गिरवी रखा गया था लेकिन कर्जदारों द्वारा बैंक से लिया गया कर्ज वापस न करने के चलते सिक्‍यूरिटी एंड रिकंस्‍ट्रक्‍शन ऑफ फाइनैंशियल असेट एंड एनफोर्समेंट ऑफ सिक्‍यूरिटी इंटरेस्‍ट (सारफेसी) कानून के तहत इन गिरवी रखी गई प्रॉपर्टी पर अब बैंक का अधिकार है। नीलामी के लिए रखी गई प्रॉपर्टी की पूरी लिस्‍ट www.bankeauctions.com/sbi पर देखी जा सकती है।

ई-नीलामी में भाग लेने की शर्तें
' हर प्रॉपर्टी के लिए ईएमडी का उल्‍लेख ई-नीलामी के नोटिस में किया गया है।
' केवाईसी दस्‍तावेज संबंधित ब्रांच में जमा कराने होंगे।
' डिजिटल सिग्‍नेचर: बोलीदाता ई-नीलामीकर्ता या अन्‍य किसी अधिकृत एजेंसी से डिजिटल सिग्‍नेचर हासिल कर सकता है।
' ई-नीलामीकर्ता द्वारा बोलीदाता को लोगिन आईडी और पासवर्ड ई-मेल के जरिये भेजे जाएंगे लेकिन इससे पहले संबंधित ब्रांच में ईएमडी और दस्‍तावेज जमा कराना अनिवार्य होगा।
' बोलीदाता ई-नीलामी पोर्टल पर लोगिन कर नीलामी के दिन अपनी बोली लगा सकता है।

होम लोन के ब्‍याज में हुई कटौती
एस.बी.आई. ने पिछले महीने होम लोन पर ब्‍याज दर में कटौती कर बड़ी राहत दी है। एस.बी.आई. 8.35 प्रतिशत की ब्‍याज दर पर 30 लाख रुपए तक का होम लोन ऑफर कर रहा है। एस.बी.आई. का यह कदम सरकार के अफोर्डेबल हाउसिंग को बढ़ावा देने के अनुरूप है।

भारतीय स्‍टेट बैंक के योग्‍य होमलोन ग्राहक प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 2.67 लाख रुपए की इंटरेस्‍ट सब्सिडी भी हासिल कर सकते हैं। यह एक सरकारी स्‍कीम है, जिसमें निम्‍न और मध्‍यम आय वर्ग के लोगों को सब्सिडाइज्‍ड होमलोन उपलब्‍ध कराया जाता है। अन्‍य बैंकों के ग्राहक भी अपना मौजूदा होमलोन एस.बी.आई. में बिना किसी प्रोसेसिंग फीस के ट्रांसफर करवा सकते हैं।

 

Source: www.punjabkesari.in


जी.एस.टी. की वजह से तैयार किए फ्लैट्स हो जाएंगे मंहगे । (19 Jun 2017)

नई दिल्लीः  भारतीय बाजार में जीएसटी बिल का उदय विभिन्न चीजों और सेवाओं को प्रभावित कर रहा है। इसके साथ ही रियल एस्टेट बाजार में बिल्डरों और ग्राहकों की समस्या हर रोज बढ़ रही है। अगर आप अपने फ्लैट के लिए बिल्डर को किस्तों में पैसे भर रहे हैं तो 1 जुलाई के बाद से आपको 12% जी.एस.टी. देना पड़ सकता है। अभी आप 4.5% का सर्विस टैक्स भरते हैं लेकिन जी.एस.टी. के बाद यह दर 12 प्रतिशत हो जाएगी। इसी तरह से अगर आप 1 जुलाई के बाद किसी ऐसे प्रॉजेक्ट में घर खरीदते हैं जो पूरा हो चुका है या होने के करीब है तो भी आपको 12 प्रतिशत जी.एस.टी. चुकाना होगा। 

 

RERA से पूरे महाराष्ट्र में सुस्त पड़ी नए प्रॉजेक्ट्स की लॉचिंग
बिल्डर्स का दावा है कि जीएसटी के बाद लगने वाले टैक्स पर 7.5 प्रतिशत (4.5 से 12%) बढ़ाने का कारण यह है कि वह जीएसटी लागू होने से पहले भरे गए टैक्सों से क्रेडिट क्लेम नहीं कर पाएंगे। ऐसे प्रॉजेक्ट्स जो पूरे हो चुके हैं या होने वाले हैं, अधिकतर खरीददार उसका 90 से 95 प्रतिशत हिस्सा दे चुके हैं।

ऐसे मामलों में भारी टैक्स का बोझ बचे हुए 5 से 10 प्रतिशत अमाउंट पर पड़ेगा। 1 जुलाई के बाद बिल्डर द्वारा जारी किसी भी इनवॉइस पर 12 प्रतिशत टैक्स लगेगा। कई डिवेलपर्स पहले ही बायर्स को बचे हुए अमाउंट पर ज्यादा टैक्स देने का नोटिस भेज चुके हैं।

Source : www.punjabkesari.in


डी.डी.ए हाऊसिंग में करीब 12 हजार फ्लैट्स, जानिए क्या होगी कीमत? (17 Jun 2017)

नई दिल्लीः डी.डी.ए. की जल्द लांच होने वाली हाऊसिंग स्कीम 2017 में करीब 12 हजार फ्लैट्स होंगे। इनमें सबसे सस्ते फ्लैट की कीमत साढ़े सात लाख रुपए होगी और सबसे महंगा फ्लैट 1.45 करोड़ रुपए का होगा। इनमें सबसे अधिक 11 हजार एल.आई.जी. फ्लैट होंगे।

12 हजार के करीब हैं फ्लैट्स की संख्या
हाऊसिंग स्कीम के लिए जो फ्लैट तय किए गए हैं, उनकी संख्या 11 हजार 899 है। इनमें सबसे अधिक 11 हजार एल.आई.जी., 444 जनता फ्लैट, 375 एम.आई.जी. जबकि 80 एच.आई.जी. फ्लैट हैं। सभी फ्लैटों को प्रधानमंत्री आवास योजना से जोड़ा गया है। इतने फ्लैटों के लिए आवदेन करनेवाला अगर पी.एम. आवास योजना का लाभ लेना चाहेगा तो वह इसके लिए आवेदन कर सकेगा।

ये होंगी कीमतें
सिंगल रूम एल.आई.जी. फ्लैट की कीमत 14.50 लाख रुपए से शुरू होकर 16 लाख रुपए तक है। इनमें से कुछ फ्लैट 30 लाख रुपए तक की कीमत वाले भी हैं। जनता फ्लैटों की कीमत 7.50 लाख रुपए से शुरू होकर 12.50 लाख रुपए तक की होगी। इसी तरह एम.आई.जी. फ्लैटों की कीमतें 31 लाख से 50 लाख रुपए तक होगी। कुछ फ्लैट 93 लाख रुपए तक के होंगे। अधिकतर एच.आई.जी. फ्लैटों की कीमत 53 लााख से 80 लाख रुपए के बीच होगी। इनमें कुछ फ्लैट 1 करोड़ 45 लाख रुपए तक के भी होंगे। इन तमाम फ्लैटों के एरिया में सबसे छोटा फ्लैट 18.80 स्क्वायर मीटर और सबसे बड़ा फ्लैट 156.61 स्क्वायर मीटर का होगा। 

 

Source :  www.punjabkesari..in


Karun Varma is appointed as DLF’s executive director to lead its north India business. (15 Jun 2017)

DLF has handed over the command of its north India business to Karun Varma by giving him the responsibility of executive director.
Varma will be responsible for leasing business, tenant relationships and building management services for DLF’s office assets in north India.

“Karun's rich experience and extensive network will further enhance offices portfolio of DLF in northern India, which he shall lead," said Sriram Khattar, MD, DLF Rental Business.

DLF is in the process to sell its 40% stake in rental business to Singapore's sovereign wealth fund GIC for about Rs 13,000 crore. With this company's net profit has been doubled to Rs 694.17 crore in financial year 2016-2017, against Rs 331.95 crore in the previous year. However, its net sales bookings fell sharply by 63% to Rs 1,160 crore during the last financial year due to demand slowdown in the property market.

DLF expects that its total rental income will to rise by 12% to about Rs 2,900 crore in financial year 2017-2018 on better realization from existing commercial assets and addition of new properties in Chennai and Delhi, the company recently said in an analyst call.

It earned a rental income of around Rs 2,600 crore last financial year.

Karun Varma, said, “Commercial office market is a bright spot for real estate sector. With the support of DLF team, I look forward to enhancing the ‘DLF Experience’ by contributing to the company’s vision of sustained growth, customer satisfaction, and innovation.“

 

Source: www. economictimes.indiatimes.com


Real Estate Developers in Maharashtra must get their projects registered under MahaRERA before July 31 as per CM’s instructions. (13 Jun 2017)

CM Devendra Fadnavis reiterated in Maharashtra that there will be no extension for registration of ongoing projects beyond July 31 under Real Estate Regulatory Authority (RERA). “As far as the appointed date for registration is concerned, I fully endorse the view of Maharashtra RERA (MahaRERA) chairman, Gautam Chatterjee,” the chief minister said, while addressing builders and developers at a conference here. Real estate developers were given a 90-day window to register their new and ongoing projects with RERA, which ends on July 31. Chatterjee had recently said that no extension would be given for registration of ongoing real estate projects beyond July 31.  “Ultimately at some point we have to register. I am of the view why tomorrow, why not today? So, get registered on the appointed date and I believe things will be smooth,” Fadnavis explained. He assured industry members that the government will be lenient for one or two years. “The authority and the government will be absolutely lenient for one or two years. On mere technical grounds, we will not allow anybody to be harassed,” he said. The chief minister said if required, say after six months if there are some practical problems, the government will look into the rules again and take care of it.

While the present operations of RERA authority will be from Mumbai, Chatterjee assured that Pune and Nagpur offices will be opened soon so that people can have their cases addressed in the same city as there is no limit on the number of offices for implementing MahaRERA. He expressed satisfaction on the implementation of RERA in the state as against other states which, he said, were lagging far behind.

“In a year’s time, the ball will be rolling smoothly,” he reiterated.  Juxtaposing RERA with the demonetization exercise, the chief minister said that RERA was announced well in advance compared to demonetization which was an overnight directive. Despite struggles, people understood the importance, he pointed out. “People fear the unknown. If we survived demonetization, what is RERA?,” he said. Speaking about the impact on business, Fadnavis explained that the government will ensure a secure and positive business environment. “Unless we give proper flexibility to the businesses they won’t flourish. Real estate is one sector which plays a major role in the economy of Mumbai and Maharashtra,” he said.

“Under MahaRERA, we will ensure all questions will be answered, and businesses will not feel any impediment,” he added. On GST, he assured the industry that the government will facilitate the smooth transition.
“Government is not an inspector but a facilitator. In that role, I assure you in one year there will be no problems left. GST regime will be working better than VAT,” he said.

Source: www.financialexpress.com


RERA रूल तोड़ने पर महाराष्ट्र में जारी हुआ पहला नोटिस (07 Jun 2017)

महाराष्ट्र रियल एस्टेट रेग्युलेटरी अथॉरिटी (RERA) ने रियल एस्टेट (रेग्युलेशन ऐंड डिवेलपमेंट) ऐक्ट 2016 के प्रावधानों और उसके तहत बने राज्य के नियमों का उल्लंघन करने के मामले में पहला कारण बताओ नोटिस जारी किया है। यह नोटिस एक प्रॉपर्टी ब्रोकर को जारी किया गया है। मुंबई के प्रॉपर्टी ब्रोकर साई एस्टेट कंसल्टेंट्स को नोटिस ऐसे कई रेजिडेंशल प्रॉजेक्ट्स के लिए ऐड करने की वजह से जारी किया गया जो महाराष्ट्र रियल एस्टेट रेग्युलेटरी अथॉरिटी (महाराष्ट्र-आरईआरए) के तहत पंजीकृत नहीं हैं। ब्रोकर अथॉरिटी के पास पहले से ही रजिस्टर्ड है लेकिन ऐक्ट के हिसाब से ब्रोकरों को सेल या ऐड की ऐक्टिविटी सिर्फ रजिस्टर्ड प्रॉजेक्ट्स में ही करने की इजाजत है।

महाराष्ट्र-आरईआरए के चेयरपर्सन गौतम चटर्जी ने बताया, 'चालू प्रॉजेक्ट्स के लिए 90 दिन का ऐड और सेल विंडो होता है, साथ ही उसको संबंधित अथॉरिटीज के पास रजिस्टर्ड होना पड़ता है। अगर ब्रोकर इस पीरियड में रजिस्टर्ड होता है तो वह नियमों के हिसाब से उन्हीं प्रॉजेक्ट्स में सेल कर सकता है जो रजिस्टर्ड होंगे। ब्रोकर ने संबंधित कानून के सेक्शन 9, 10 और रजिस्ट्रेशन रेग्युलेशन के रूल 14 का उल्लंघन किया है।'

ब्रोकर ने नोटिस मिलने की बात की पुष्टि की है। उसने अथॉरिटी को नोटिस का जवाब पहले ही भेज दिया है। महाराष्ट्र में रियल एस्टेट रेग्युलेटरी अथॉरिटी (RERA) ऐक्ट लागू होने के बाद कुल 22 रियल एस्टेट प्रॉजेक्ट और 1100 से ज्यादा प्रॉपर्टी ब्रोकर्स ने इसके तहत रजिस्ट्रेशन कराया है। केंद्र सरकार ने रियल एस्टेट (रेग्युलेशन ऐंड डिवेलपमेंट) ऐक्ट 2016 लागू किया है और इसके सभी सेक्शन इस साल 1 मई से प्रभावी हो गए हैं। महाराष्ट्र ऐक्ट के तहत फटाफट अपने रूल्स का नोटिफिकेशन जारी करने वाले राज्यों में एक था। उसने अपने यहां महाराष्ट्र-आरईआरए लागू किया है।

लगभग 100 प्रस्तावकों ने रजिस्ट्रेशन के लिए अपने प्रॉजेक्ट्स के डीटेल तो दिए हैं लेकिन उन्होंने पेमेंट और सबमिशन का अंतिम चरण पूरा नहीं किया है। रेग्युलेटर को उम्मीद है कि रजिस्ट्रेशन प्रोसेस जल्द जोर पकड़ेगा और 15 जून तक बड़ी संख्या में परियोजनाओं का रजिस्ट्रेशन हो जाएगा।

SOURCE: www.punjabkesari.in


नॉर्थ दिल्ली के लोगों को प्रॉपर्टी की ओनरशिप चेंज कराना पड़ेगा महंगा l (03 Jun 2017)

नॉर्थ दिल्ली में रहने वाले लोगों के लिए एक बुरी खबर है क्योंकि नॉर्थ एम.सी.डी. ने म्यूटेशन फीस 10 गुना बढ़ाने का प्लान बनाया है। जिसके तहत लोगों को प्रॉपर्टी की ओनरशिप चेंज कराना महंगा पड़ेगा। अफसरों का कहना है कि म्यूटेशन फीस 150 रुपए से बढ़ाकर 1500 रुपए किया जाएगा। जिन लोगों को म्यूटेशन सर्विस का लाभ हफ्ते भर में लेना है, उनके लिए तत्काल सर्विस भी लागू किया जाएगा।

देनी होगी इतनी फीस
अफसरों का कहना है कि आज के हलात को देखते हुए म्यूटेशन फीस 1500 रुपए प्रति केस करने का फैसला किया गया है। इसके अलावा जिन लोगों को म्यूटेशन सर्विस तत्काल चाहिए, उन्हें समान्य फीस की तुलना में और अधिक फीस देना होगा। ऐसे मामलों में तत्काल सर्विस के लिए लोगों को 2000 रुपये म्यूटेशन फीस देना होगा।

इसलिए बढ़ाए गए रेट
नॉर्थ एम.सी.डी. के एक सीनियर अफसर के अनुसार एम.सी.डी. एक्ट 1957 में बनाया गया था। उस दौरान म्यूटेशन फीस 150 रुपए तय किया गया। इसके बाद फीस में बढ़ौतरी ही नहीं की गई। अफसरों का तर्क है कि 59 सालों में काफी कुछ बदलाव आया है। प्रॉपर्टी के रेट बढ़ गए हैं। प्रॉपर्टी टैक्स कैलकुलेशन रेट यूनिट एरिया से बदलकर कवर्ड एरिया के अनुसार कर दिया गया है। लेकिन, म्यूटेशन फीस में कोई बदलाव नहीं किया गया। इसलिए म्यूटेशन फीस में बढ़ौतरी का प्लान बनाया गया है।

SOURCE:www.punjabkesari.in


Benami Transactions Bill : Government Unearths 400 Transactions (26 May 2017)

The Benami Transactions (Prohibition) Amendment Bill, 2015 was introduced in Lok Sabha on May 13, 2015. The Bill seeks to amend the Benami Transactions Act, 1988. The Act prohibits benami transactions and provides for confiscating benami properties.

The Bill seeks to: (i) amend the definition of benami transactions, (ii) establish adjudicating authorities and an Appellate Tribunal to deal with benami transactions, and (iii) specify the penalty for entering into benami transactions.

It may have taken the government over 28 years to implement the Benami transactions law — with the passage of an amendment Bill, the Benami Transactions (Prohibition) Amendment Act, 2016, came into force on November 1, while the legislation was first enacted in 1988. However, the Centre is in no mood to waste any time as it goes after nabbing the culprits in fast-forward mode.

Results have begun to show within days of the Central Board of Direct Taxes (CBDT) setting up 24 Benami Prohibition Units (BPUs) to crack the whip on the unaccounted transaction.

According to an official release, the Income-Tax Directorates of Investigation have identified more than 400 Benami transactions up to May 23, 2017. These include deposits in bank accounts, plots of land, flat and Jewellery.

“Immovable properties have been attached in 40 cases, with a total value of more than Rs 530 crore in Kolkata, Mumbai, Delhi, Gujarat, Rajasthan and Madhya Pradesh,” the department told Press Trust of India. According to the report, premises of 10 senior government officials were raided in the past one month to unearth black money earned through corrupt practices and introduce accountability and probity in public life.

Earlier, the Prime Minister Narendra Modi-led government had pledged to strictly implement the Benami Transactions (Prohibition) Act, 1988, to curb corruption. 

The Law

For the uninitiated, the Persian term Benami stands for a proxy. Investing in an asset using another person as a proxy is known as Benami transaction. Benami property includes movable and immovable, tangible and intangible, corporeal and incorporeal assets. Land being one of the most valuable assets, most park their money in property using a proxy to save taxes. Benami transactions also lead to sharp rise in property prices, making it unaffordable for an average India.

Under the provisions of the law, a Benami property could be attached and subsequently confiscation. Apart from that, a jail term of up to seven years can be imposed on a benamidar or the beneficiary. That is not all. A beneficiary might also have to pay as much as 25 per cent of the market value of the property as fine. There are also provisions for punishing the abettor --- a rigorous imprisonment of six months to seven years for providing false information. An abettor will also be liable to pay 10 per cent of the market value of the property as fine.

The guilty will be punished and justice will be met. But, the confiscated properties could be put to better use if the government goes ahead with a recommendation made by top-level bureaucrats. A group of senior bureaucrats had earlier suggested confiscated properties be used to build affordable houses for the poor. At a time when the government is working towards meeting the ambitious target of providing housing for all by 2022, this is an option worth trying.


GST Effect on Real Estate: Relief for home buyers as flats prices may drop. (24 May 2017)

Implementation of goods and services tax (GST) after the approval from central government has impacted different sectors in both positive and negative direction. Following this housing price are likely to drop by up to 5% after the Centre and states decided to peg the levy at 12% on finished houses or apartments.
 

The net price of houses in the affordable segment, which cost up to Rs 30 lakh (at Rs 3,500 per sq ft of built-up area) should fall by 5%. Once GST kicks in, home buyers will not have to pay the 4.5% service tax on the final price that they shell out while taking possession.

As a result, tax consultants and realtors said that fixing the GST rate at 12% was a customer-friendly move and would lead to either lower tax liability or be tax neutral.

After allowing for credit for taxes paid on inputs such as cement, steel, paints and other items, the actual burden will be lower. As a result, the price of a Rs 1-crore apartment may come down by Rs 3-5 lakh, said a consultant.
For a premium product, however, Credai chairman and CMD of ATS Infrastructure Geetambar Anand said that at 12% GST, customers will benefit from projects that cost up to Rs 6,000 per sq ft.

A premium project may not gain significantly as developers build high margins into such properties. Manoj Gaur, Credai  vice president and MD of Gaursons, said that if input credits are allowed properly, the 12% GST rate is favorable to buyers.

Suresh N Rohira, partner, Grant Thornton India, said that GST at 12% would certainly bring down the tax liability in the affordable segment. He said that the taxes on inputs for construction are more than 12% of the final price.
 

But if a developer is working with a high margin, which is the case in premium project, the net tax will remain significant. Priyajit Ghosh, partner - indirect tax, KPMG India, said that under the GST regime, 12% GST on construction sector would make the sector better off. Because of input credit, the net tax on finished product would have a downward pressure.

According to a Crisil report, at present, a developer pays excise tax and VAT on inputs like cement and steel at 27.7% and 18.1% respectively, which vary from state to state. Now, cement and steel will be taxed at 28% and 18% respectively under GST.

Similarly, other inputs like paints and white goods are going to be taxed at 28%. But the final product that is a housing unit will be taxed at 12%, with the allowance of credit against taxes paid on inputs. But as 12% tax will be levied on entire cost including the land, the amount will be sufficient enough to provide for the input credit, said Ghosh.

He said that 12% tax rate is favorable to the industry. For normal houses (up to Rs 6,000 per sq ft), 12% GST on a finished house or an apartment will be effectively reduced to near zero as the developer will take the credit for taxes he paid on inputs. At the same time, the buyer will not have to pay the service tax4.5% of the price of the house.

This will reduce the cost of acquisition of the house. In some cases, even input credit could be more than the GST levied on the finished product, but a developer can claim a maximum credit to the extent of the GST he would be paying on the finished product.

Take a simple example: A developer is completing a housing project where the work has been awarded to a contractor. The cost of construction is around Rs 2,000 per sq ft, the going rate in the market for average quality. The contractor will collect a tax at 18% on the amount at which he is completing the work.

In this case, he will collect a tax of Rs 360 on Rs 2,000 per sq ft from the developer. If the developer sells the house at Rs 3,000 per sq ft built-up area, which is the going rate for the affordable segment housing, he will pay a tax at 12 % on the final cost. In this case, it will be also Rs 360 per sq feet.

Therefore, his fresh tax liability would be nil. If other expenses and tax paid thereon is included, the developer could have claimed more. But under GST, he can claim only up to the fresh tax liability. But the service tax that a buyer pays so far at the rate of 4.5% will not be levied now. So the next cost for buyers of not-so-premium houses will decline. But if the product is in the premium segment, the entire input tax credit is not sufficient to bring down the fresh tax liability to nil.

A premium construction can be done at Rs 5,000 per sq ft. The net tax collected by works contractor would be Rs 900 per sq ft from the developer. But while selling at Rs 10,000 per sq ft, the developer needs to pay Rs 1,200 per sq ft. Therefore, after adjusting against the taxes on input, he will have to pay Rs 300 per sq ft or 3%, which he will recover from the customer. But as the developer will also pay taxes on other expenditures, the net tax liability at 12% GST on finished product would be very small.

SOURCE: economictimes.indiatimes.com


8,000 home registries to be ensured by Greater Noida Development body in 6 months. (20 May 2017)

The Greater Noida Authority on Friday said that it was pulling out all the stops to fast-track the handover of the maximum number of residential units to homebuyers in Noida Extension (now known as Greater Noida West).

In the past two months alone, four developers with more than 5,500 residential units have procured completion certificates for their group housing projects. Four more developers have been given timelines to get completion certificates starting next week, officials said.
 

While 6,000 registries of homes, mainly of the Gaur group, have already been completed in the past six months, GNIDA is getting ready to complete registries of another 8,000 homes in Noida Extension in the next six months.

Janardan, additional CEO, GNIDA, said the issue of pending completion certificates led to harassment of buyers, who have been running from pillar to post to procure possession of their homes. “In the past two months, we have completed the process of completion for four projects including Mahagun Mywoods (1,802 units), Palm Olympia (1,672 units), Eros Sampoornam (1,798 units) and Galaxy Vega (400 units),” the ACEO said, adding, “Registries for these housing projects will start soon, following which possession will be handed over.”

Janardan said many developers have also deposited their outstanding dues. “Since November 1, 2016, to date, we have collected Rs 607 Crore from builders,” Janardan said.

“For 634 units in Supertech Eco-Village-3, the process for completion will commence on Monday. The process for Supertech’s Eco-Village 1 and 2 is also already under way for about 1,500 units. Also on the anvil is completion for 300 units of Panchseel Greens-2, while those of Shree group and Vedantam are in the pipeline,” he said.

GNIDA,additional CEO, said that with this move GNIDA would be able to reschedule about Rs 100 crore till 2020-2023 besides addressing the roadblock being faced by builders in starting construction and in obtaining their completion certificates. “Eleven more builders are in the pipeline for the rescheduled payment plan. The aim is to fast-track handing over of residential units to homebuyers,” he said.

SOURCE : economictimes.indiatimes.com


Land pooling: Delhi Government declares 89 Villages as Urban Areas (19 May 2017)

Delhi government has declared 89 villages as urban areas which will help the authorities develop infrastructure projects in those localities. The Urban Development Department of the Delhi government issued a notification in this regard yesterday, after Lt Governor Anil Baijal approved the Delhi DevelopmentAuthority's(DDA),Land-PoolingPolicy(LPP).

The policy was stuck for around two years. After the approval of the LPP for the 89 villages, the Delhi government won't need to buy land from the DDA for developing facilities such as electrical sub-stations, stadiums, industrial areas, old-age homes, hostels, schools, etc.

Sultanpur Dabas, Bazidpur Takran, Mukhmelpur, Neb Sarai, Baprola, Bakkarwala, Goela Khurd, Neelwal, Salahpur Majra are among the villages which have been declared as urban areas by the AAP government.

The LPP is aimed at getting individuals or a group of land-owners - living in urban villages on Delhi's periphery - to pool their land and hand it over to the DDA. The DDA will develop public infrastructure like roads on part of the pooled land and return a substantial portion of the plot to the owner. The returned portion of the land will have its value increased due to the development of infrastructure nearby. The policy's implementation assumes significance as the DDA's Master Plan Delhi (MPD) 2021 proposes construction of 25 lakh housing units by 2021 for which 10,000 hectares of land will be required.

As per DDA estimates, 2.5 lakh houses, including 50,000 EWS (Economically Weaker Sections) units, will require 1,000 hectare of land. Providing relief to small farmers, self-penalty on DDA for delays, and flexibility to farmers to trade their land or tie up with developers for land-pooling are some of the important features of the policy.

 

Welcoming the move, BJP MLA and Opposition Leader in the Delhi Assembly, Vijender Gupta said the "historical" move would accelerate the process of providing affordable housing to 20 lakh families.

"It would fill up Delhi's infrastructural deficit that has led to cropping up of unauthorized colonies. The notification comes due to direct cognizance taken by the Delhi L-G," Gupta said.

SOURCE: timesofindia.indiatimes.com


CBDT’s Draft Income Calculation Norms For Real Estate (18 May 2017)

The revenue deparment has released a draft last week for computation of income for the real estate sector, under which transactions with regard to sale and purchase of units will be recognized at arm’s length price.
The proposed Income Computation and Disclosure Standards (ICDS) for Real Estate Transactions, which follows the guidance note of Institute of Chartered Accountants of India (ICAI), is aimed at providing "uniformity, certainty and harmonizing the norms with the provision of the Income Tax Act".

The draft includes implementation of the Real Estate (Regulation and Development) Act, 2016 (RERA).As per the draft, the revenue and cost will be recognized with reference to the stage of completion of the project, which too has been defined. The norms will apply for determination of income from all form of transactions in the real estate with respect to land, buildings and rights therein.

The ICDS deals with sale of plots of land with or without development of common facilities, development and sale of residential and commercial units, transfer of development rights, and re-development of existing buildings and structures.

The Central Board of Direct Taxes (CBDT) has invited comments from stakeholders on the draft till May 26. The draft defines fair values as "the amount for which an asset could be exchanged between a knowledgeable, willing buyer and a knowledgeable, willing seller in an arm's length transaction". "Most of the deviations from the ICAI's guidance note will have the effect of accelerating revenue recognition for tax purposes.

"Specifically, the change requiring recording Transferable Development Rights (TDRs) at fair value will create tax incidence on unrealized revenues," said Abhishek Goenka, Partner PwC.

While the guidance suggested that TDRs should be recorded at fair market value or net book value, the ICDS proposes that they should be calculated at the fair value of the development rights acquired. Goenka also said that with the advent of RERA, "removal of the critical approvals test for revenue recognition is a logical step".

Commenting on the draft, JLLR Chairman Anuj Puri said the government has already made its intention to make all real estate related transactions clear with the Benami Property Act and RERA. "Via these and various related measures, the message being sent out is that transactions related to property and any income arising from such transactions will no longer be hidden and must be reported and declared," he said.

Rakesh Bhargava, Director, Taxmann.com said: "The proposed ICDS shall be applicable for determination of income from all forms of transactions in real estate, which refers to land as well as buildings and rights in relation thereto". The companies will have to disclose the aggregate amount of cost incurred, profits recognized, advances received and work in progress along with inventories, the draft said.

SOURCE : economictimes.indiatimes.com


Yamuna Expressway Authority Cuts Interest Rates (16 May 2017)

Yamuna Expressway Industrial Development Authority (YEIDA) has taken an initiative to reduce the interest rates by 1.35% on installments it receives from over 26,000 allottees against property bought from it. The Authority is also thinking over to cut the interest rates by another 1.15% in the near future. YEIDA’s Chairman, Prabhat Kumar has also released a schedule for possession of 10,500 plots and another 5,100 flats allotted in 2009.

"We have reduced the interest rates and are in talks with banks for reducing it further," said Kumar.

"We are also getting ready to hand over possession of more than 15,000 residential plots and flats by December 2017. The first lot of 3,055 allottees have already been issued possession letters by the Authority in January and February. By the end of June, we will hand over possession to 416 allottees. Thereafter, by November 30, another 1,437 plots will be handed over and 8,156 plots in another month," said Kumar.

"We have also given an offer to plot owners to return half of their land to YEIDA. There are 123 people who have been allotted 4,000 sq meters, 292 people who have been given 2,000 sqm of plot, 1,219 who have been allotted 1,000 sqm of land," he said.

Starting June 2017, YEIDA will also start handing over possession of 5,100 residential units. "By June 30, 2,970 flats will be handed over and another 2,130 a month later," Kumar said. These plots and flats are located in sectors 18, 20, 22A and 22D.

Starting June 2017, YEIDA will also start handing over possession of 5,100 residential units. "By June 30, 2,970 flats will be handed over and another 2,130 a month later," Kumar said. These plots and flats are located in sectors 18, 20, 22A and 22D.

SOURCE:- economictimes.indiatimes.com


RERA-Impact on Real Estate Prices (13 May 2017)

From May 1, RERA-2017 the 2016 became effective in  the entire country following which each state will have its own Regulatory Authority (RA) which will make rules and regulations according to the Act.

With the RERA in place, will the real estate prices move up especially in the residential market? The answer to this may not be straight. While the new rules demands  a much stricter compliance and transparency, which may push the real estate prices up especially for the new launches, the large amount of inventory overhang in the system, will probably keep the price rise till the supply gets over.

Existing Inventory
A major portion of the existing supply relates to under construction properties including unsold inventory which could take around 12 months or more to complete. All such projects would now be needed to be registered under RERA and must be developed under new rules.

One such new rule relates to the sale of real estate on the basis of super area and not on super built up area. Till now, the industry used to sell real estate based on super built up area. Now RERA wants projects to be sold on carpet area.

New Launches
RERA provisions would now ensure strict control on management of funds and timely delivery of projects. "There will be now a pressure on delivering the projects on time and this pressure will be translated to contractors who will demand much higher rates for construction. This, in turn, will lead to rise in prices for the end customer, however, on an overall basis the total cost of ownership will actually reduce even though the sticker price of purchase goes up," says Rohit Gera, MD, Gera Developments and VP Credai, Pune Metro.

With the implementation of RERA, the overall costs of development of real estate projects are expected to rise and the same is likely to result in an increase in the prices of the real estate projects.

The Act does not bring the government authorities into the ambit who are responsible for the continuous changes in regulations, lack of transparency and predictability in functioning. If approvals will not streamlined on time then cost revisions and delays will become unavoidable.

Transfer of risk will lead to price rise


With RERA in place, in case if a default, the buyers will now have something to fall back upon. Rohit Gera, MD, Gera Developments and VP Credai, Pune Metro, says, "Earlier, the risk on account of delays, quality, title, and changes in the project were all taken by the customer. As an impact, most customers had to deal with some sort of the default and were forced to bear the cost for this default. After the launch of RERA, these costs will now be owned by the developer and there will be a consequential premium that the flat purchasers will have to pay for transferring this risk to the developer In my opinion, there is no headroom for developers to absorb these increased costs and immediately upon the first opportunity we will see this cost being transferred on to the home purchase with increase in prices."


Conclusion
As per the estimates so far, the industry will not witness a huge onslaught of new launches for few more quarters. Builders are already under pressure with under construction projects and will face issues in bringing them under RERA, complying with new norms, arranging funds that they would have already used and then completing those projects within the new agreed time period.

It's time to move with caution for those buyers looking to book properties anytime between May 1 and July 31. After demonetization and RERA, there is an anticipation of a significant consolidation drive in the real estate sector that could result in a large number of small time and unorganized developers being wiped out.  So, if you are getting a lucrative deal and offer on the on-going projects from small-time builders, which are not yet registered under RERA, it's better to stay away from them.


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